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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

नीचे रहकर भी पर्वत के मंदिर और शिखर को देख सकते हैं


संयम स्वर्ण महोत्सव

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पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने आशीष वचनों में कहा कि आप नीचे रहकर भी पर्वत के मंदिर और शिखर को देख सकते हैं। एक बार दृष्टी से दिखाई दे जाते हैं। जहां से रास्ता होता है वही से मंदिर की तरफ जाया जाता है। जब पहाड़ चढ़ते हैं तो झुकना पड़ता है,साबधानी रखनी पड़ती है। व्यबधान का समाधान एकाग्रता,संकल्पशक्ति में होता है। रास्ते को सुव्यवस्थित करने से आगे बढ़ा जा सकता है। रास्ते में नदी आती है तो नाव के सहारे नाविक आपको पतवार चलाकर पार लगाता है। जब उस पार पहुँच जाते हैं तो स्वयं चलकर फिर लक्ष्य की और बढ़ना पड़ता है। कोई आपके साथ नहीं जाता है। स्वयं का सम्यक दर्शन, ज्ञान और चारित्र जागृत करने पर ही मोक्ष मार्ग पर बढ़ा जा सकता है। यदि इस मार्ग का अनुशरण करना है तो उस पथ पर आरूढ़ पथगामी का अनुशरण करते जाओ।

 

उन्होंने कहा कि व्यवधान आते हैं परंतु यदि साधन को साधन मानकर उसे पीछे छोड़ कर आगे बढ़ेंगे तो बढ़ते चले जाएंगे। जो संसारी भ्रमजाल में फंसे हैं वे बिकलांग के सामान हैं पहले मानसिक विकलांगता को छोड़ना पडेगा अपने भीतर की ऊर्जा को संचारित करना पडेगा। अपने पैरों को पहले मजवूत बना लो उसके बाद इस कठिन मार्ग की यात्रा का शुभारम्भ करो। सड़क को उपयोग करो उसे अपना मत बनाओ ऐंसे ही मोह को छोड़कर मोक्ष की यात्रा प्रारम्भ करें और सदगुरु को पकड़ कर चलो। सारे व्यवधान को दूर करते हुए आगे बढ़ो। व्यवधान का समाधान अवधान से ही हो सकता है।

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