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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

मूकमाटी चौथा सत्र


संयम स्वर्ण महोत्सव

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पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपने आशीर्वचनों में कहा कि आजकल चित्र का जमाना चल रहा है, सभी लोग चित्र में अपना चित्त लगा कर बैठे हैं परंतु ये चित्र आपके चारित्र को कमजोर कर रहा है। बाहर का चित्र हमेशा आकर्षित करता है जिसके मोह में आप सभी पराश्रित हो जाते हैं । जब हम अंतरंग के चित्र को निहारते हैं तो  यथार्थ का बोध होता है और यहीं से चारित्र निर्माण की यात्रा प्रारम्भ होती है।

 

उन्होंने कहा की कोई भी काव्य शब्दों की अभिव्यक्ति को व्यक्त करने का सशक्त साधन  होता है। आज विद्यार्थियों को यदि शिक्षा के साथ सार्थक ज्ञान का भी बोध कराया जाय तो शोध की दिशा उन्हें सही दशा तक ले जा सकती है।

 

श्री कुठियाला ने कहा की मूकमाटी में पिरोया हुआ प्रत्येक शव्द एक मोती की भाँती है जो सम्पूर्ण होकर जीवन की एक माला का रूप ले लेती है। आज के जो पत्रकारिता क्षेत्र के विद्यार्थी हैं उन्हें इसके अध्ययन से बहुत ही सशक्त ज्ञान की उपलब्धि हो सकती है। महात्मा गांधी विश्व विद्यालय बर्धा के कुलपति गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि प्रत्येक पंक्ति अपने आप में जीवन के यथार्थ को सहेजे हुए लगती है, ये एक महाकाव्य न होकर सम्पूर्ण जीवन दर्शन परिलक्षित होता है। प्रो. श्रीराम परिहार खंडवा ने कहा की प्रत्येक पंक्ति से ऊर्जा का संचार करने वाली तरंगें प्रवाहित होती हैं। मूक माटी काव्य न होकर एक धर्म ग्रन्थ जैंसा है जो आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।  वरिष्ट साहित्यकार और कवि कैलाश मड़बैया ने अपनी कविता के माध्यम से अपनी भावांजलि प्रस्तुत की।

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