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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

माया से बचने का प्रयास


संयम स्वर्ण महोत्सव

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पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागरजी महाराज ने कहा क़ि माया से बचने का प्रयास करो क्योंकि माया की छाया पतन की ओर ले जाती है। जब छाया आपकी कहीं पड़ती है तो प्रकाशमान वो स्थान भी प्रकाश रहित हो जाता है इसी प्रकार माया की छाया से आपका प्रकाशित जीवन भी अंधकारमय हो जाता है।विक्रिया ऋद्धि सदुपयोग में लगती है तो दिन दूनी रात चौगुनी बृद्धि आपके जीवन में हो सकती है। अंधेरों से निकलकर उजालों की बात करो। देवलोक में कभी रात नहीं होती , थकावट नहीं होती परंतु वो धरती पर मनुष्यों को देखकर लट्टू हो जाते हैं । धरती पर मनुष्य कोई मन्त्र सिद्धि में लगा है कोई तंत्र सिद्धि में लगा है परंतु सिद्धि उसे ही होती है जिसके मन में उसके सदुपयोग की भावना होती है। आप लोगों के यहाँ दीपक जलता है , दीपक प्रकाशवान होता है परंतु आप पर ये कहावत चरितार्थ होती है "दिया तले अँधेरा" क्योंकि ज्ञान का आप सदुपयोग नहीं करते हो। हम प्रकाश के निकट रहकर भी प्रकाश के महत्व को समझ नहीं पा रहे हैं । इतिहास को पढ़ने से ज्ञात होता है कि प्रकाश की क्या महिमा होती है पहले रत्नों के दीप से पूरा जिनालय प्रकाशवान हो जाता था , रत्नों का प्रकाश ऊपर नीचे चारों तरफ फैलता था ऐंसे ही ज्ञान की आराधना करोगे तो रत्नत्रय रुपी दीप से सम्पूर्ण जीवन प्रकाशमयी हो जायेगा।

 

उन्होंने कहा कि घरवार , परिवार ,व्यापार छोड़कर भगवान के द्वार पर पर्युषण पर्व में आप सभी आने बाले हो यदि रत्न रुपी दीपक प्राप्त करने आओगे , अच्छी भावना से आओगे तो हम से बो प्राप्त कर लोगे जिसकी जरूरत आपको है । ऊपरी आँख खोलने से ऊपरी तत्वों को पा सकते हो परंतु आत्मतत्व को पाने के लिए तो भीतर की आँख खोलनी ही पड़ती है , भीतर की आँख खोलो तो आत्मदर्शन अवश्य हो जाएंगे। संयम और साबधानी पूर्वक यदि अध्यात्म का रसपान करोगे तो बो सब प्राप्त होगा जो आपको अन्धकार से प्रकाश की और ले जाएगा।

 

आचार्य श्री ने कहा की आप सभी को ज्ञान को ही दीपक बना कर चलना है । ये राजधानी है पहले यातायात पुलिस हाथ से यातायात नियंत्रित करती थी अब लाइट के माध्यम से नियंत्रण होता है ऐंसे ही अध्यात्म में ज्ञान के प्रकाश के माध्यम से आत्मनियंत्रण होता है परंतु संयम और साबधानी से चलने की आवश्यकता है । अपने ज्ञान के दीपक को जागृत करके आगे बढ़ो मोक्ष मार्ग की बाधाएं स्वयमेव ही दूर होती चली जाएँगी । चाहे चांदी का दीप जलाओ या सोने का प्रकाश उतना ही होगा परंतु यदि मन का दीप जलाओगे तो पूरा जीवन भी प्रकशित होगा और आपके प्रकाश से आसपास भी प्रकाश फ़ैल जायेगा। एक बार आप की भीतर की आँख खुल जाय तो बाहरी पदार्थों को देखने की चेष्ठा नहीं करोगे क्योंकि जो भीतर प्रकाश की किरण है उसके सामने बाहरी पदार्थों का कोई मोल ही नहीं है। आप सभी बहुत स्वार्थी हो गए हो पूजन में पूरा आनंद ले लेते हो हमें बोलने का मौका ही नहीं देते हो।

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