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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

पानी के वेग में उशी दिशा


संयम स्वर्ण महोत्सव

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"नदी में बाढ़ आती है , बाढ़ उसे बोलते हैं जिसमें पानी का वेग होता है जिसमें सब कुछ बेहतर जाता है ।"  उक्त उदगार पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने कहा की  बाढ़ के वेग में अच्छे अच्छे कुशल नाविक भी घबराया जाया करते हैं ,पानी के वेग में उशी दिशा में बहना पड़ता है नदी को हम कुशलता पूर्वक पार कर सकते हैं ऐंसे ही कर्मों का वेग है जिसमें हमको उसी की गति के अनुसार बहना पड़ता है । जब कर्मों का वेग धीमा होता है उस समय हम अपना पुरुषार्थ कर सकते हैं।

 

आचार्यों ने कहा है की जब भूख न लगी हो तो किसी को जोर जबरदस्ती से खिलाया नहीं जा सकता । ऐंसे ही जब नदी के बेग की भांति कर्मों की धीमी गति होने पर आत्मा को ज्ञान का डोज दिया जा सकता है । जब कर्मों का तीव्र उदय होता है कुछ नहीं किया जा सकता ज्ञानी व्यक्ति कर्मों की रफ़्तार को धीरे होने की प्रतीक्षा करता है । गुणवत्ता बाली बस्तु को सभी पसंद करते हैं और प्राथमिकता उसे ही देते हैं परंतु कभी कभी विज्ञापन के प्रभाव में गुणवत्ता का आभाव हो जाता है और कम गुण बाली बस्तु से संतुष्ट होना पड़ता है। आज विज्ञापन का इतना जोर है है क़ि समाचारपत्रों में विज्ञापन की अधिकता के कारण ख़बरों की गुणवत्ता कम हो जाती है । कोई भी निष्कर्ष तभी निकलता है जब हम गुणवत्ता को अच्छे से परख लेते हैं । कुशल तैराक भी बाढ़ में बेह जाता है उसी प्रकार आप लोग भी विज्ञापन की बाढ़ में बह रहे हो।

 

उन्होंने कहा कि लोहे को बैसे आसानी से नहीं मोड़ा जा सकता परंतु अग्नि के निमित्त से उसे किसी भी रूप में ढाला जा सकता है इसी प्रकार आत्मा को भी पुरुषार्थ से अच्छे रूप में ढाला जा सकता है। आचार्यों ने कहा है की ऐंसे वातावरण में रहना चाहिए जहाँ कषाय का वेग उत्पन्न न हो । आपकी कषायों की वेग आपके नियंत्रण से बहार होती है इसलिए पहले इसे नियंत्रित करें ,अंकुश लगाएं। आत्मा अनंतकाल से कषायों की वेग की वजह से नियंत्रित नहीं हो पा रही है।पुरुषार्थ की भूमिका बनाने के लिए आचार्यों ने इसीलिए प्रेरित किया है। एक बार में कोई भिखारी नहीं बनता बल्कि धीरे धीरे काम बनते हैं और प्रयासों से बनते हैं ,भूमिका बनाने की आवश्यकता है, चिंतन की आवश्यकता है और उसके साथ ही अपने आदर्शों के जीवन को सामने रखकर काम में जल्दी सफलता मिलती है । महापुरुषों ने सभी तूफानों ,बाढ़ोंं और वेगों में अपने पुरुषार्थ से सामना करके उन्हें दरकिनार किया है । जो आदर्श वादी जीवन हमारे पूर्वजों ने जिया है बही हमें संघर्षों के लिए प्रेरित करता है । उनके अनुभव् , सूझबूझ , संकल्प , दृढ़ता उनकी अनुपस्थिति में भी हमारे काम आ रही है , उनके विचार, उनके द्वारा बताए गए संकेत और सूचनाएं हमारे लिए पथ प्रदर्शक का काम कर रही हैं।

 

उन्होंने कहा क़ि अध्यात्म का आनंद तभी आता है जब हम उसमें गोते लगाने का मन बनाते हैं। संयम के मार्ग पर चलने से ही मीठे फल की प्राप्ति होती है इसलिए आप लोग धीरे धीरे इस मार्ग का अनुशरण करते जाएँ । साबधानी पूर्वक चलते जाएँ वातावरण आपके अनुकूल स्वयं ही निर्मित होता जायेगा । अच्छे मार्ग का अनुकरण करने पर ही मंजिल को पाया जा सकता है। जो प्रवाह है, परंपरा है उसकी गति रुकनी नहीं चाहिए निरंतर चलायमान रहें पीछे लौटने का उपक्रम न करें।

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