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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

काया है तो आत्मतत्व है


संयम स्वर्ण महोत्सव

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पूज्य आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज ने अपनी मंगल देशना में कहा क़ि काया है तो आत्मतत्व है आत्मतत्व है तो सब कुछ है । देह में होनहार देव बैठे है । मायाजाल और जड़ की बहुत पूजा हो चुकी अब तो दुर्लभता की पूजा होनी चाहिए । जीवन त्रैकालिक नहीं होता परंतु शरीर स्वस्थ्य रहेगा तो आत्मा निरोगी रहेगी । घी को घी की तरह लेना चाहिए पानी की तरह नहीं पीना चाहिए भोजन उतना ही लें जितना शरीर के लिए आवश्यक है । अधिक भोजन दुगना भोजन नुकसानदायक होता है उसी तरह संग्रह की प्रवत्ति भी जीवन को परिग्रह के पाप से ग्रस्त कर रही है । आत्मा को बीमार बना रही है । उन्होंने कहा क़ि जंगल तप रहा है नदी नाले सूख रहे हैं एक परिवार उस जंगल में भूख से व्याकुल है सुबह भोजन नहीं मिला शाम की आशा में मन टिका हुआ है , शाम हो जाती है परंतु कुछ खाने नहीं मिला । दुसरे दिन भी सिर्फ पानी से ही भूख प्यास मिटाने की कोशिश की जा रही है । तीसरे दिन आशा का दीपक टिमटिमाने लगा परंतु कुछ घास का चावल मिल जाता है तो उससे घास की रोटी तैयार होती है परंतु सीमित संख्या में और उसी में परिवार को संतुष्ट होना पड़ता है। ये भारत का अमिट इतिहास है ये शौर्य की गाथा है उन महापुरुषों की जिन्होंने संस्कृति की रक्षा में अपने प्राणों की परवाह नहीं की ।महाराणा प्रताप साहस की प्रतिमूर्ति थे, उन्होंने धैर्य नहीं खोया प्रजा की रक्षा की पवित्र भावना को कायम रखा । आचार्य श्री ने कहा की संकट में ही धर्मसंकट आता है परंतु सच्चा राजा वही होता है जो संकट में भी धर्म को नहीं छोड़ता। झीलों का पानी जब बहता है तो सागर में ही विलीन होता है । राणा प्रताप एक तरह से जैन संस्कृति पर ही चला त्याग के पथ पर चला इसलिए तलवार और ढाल का उपयोग अहिंसा के पालन की भावना में ही किया था। गुरुवर ने कहा की राजा तो राजा होता है जो कभी कर्तव्यविमुख नहीं होता परंतु आज राजा छोटे से संकट में भी धर्म से किनारा करने लग जाते हैं । आज इतिहास लुप्त होने के कारण हम संस्कृति को विलोपित करते जा रहे हैं । इतिहास के पुनर्जागरण की आवश्यकता है ,उसे युवा शक्ति को समझने की जरूरत है । हम निरंतर काम करते जाएँ तो थकावट पसीने के माध्यम से निकल जाती है । निष्ठा के आभाव में प्रतिष्ठा भी कुछ नहीं कर सकती है । निःस्वार्थ व्यक्ति ही जीवन में प्रतिष्ठा पाने के योग्य होता है और संसार में तालिया भी उस ही के लिए ही बजती है ।मित्र और दोस्तों के बारे में उन्होंने कहा कि जो आपके बारे में हित, मित और प्रिय सोचे वही सच्चा मित्र होता है और जो एक दूसरे के पूरक हो वो सच्चे दोस्त होते है अगर आप एक दूसरे के पूरक बन जाओ तो जीवन में आनंद ही आनंद है।


उन्होंने आगे कहा की आज रईस व्यक्ति औषधियों के सहारे जीवित है और समय पर धन और वैभव भी उसके काम नही आता है केवल धर्म और पुरुषार्थ ही काम आता है।

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