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करुणा के अवतार - 87 वां स्वर्णिम संस्मरण

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संयम स्वर्ण महोत्सव

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सुगमपथ वीतराग मार्गी आचार्य गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणो में नमोस्तु-नमोस्तु- नमोस्तु....हे हितचिंतक गुरुवर! जन्म- जन्मांतरों से प्राणी मित्र विद्याधर स्वयं किसी जीव की हिंसा नहीं करते और ना ही परिवार जनों को करने देते थे। इस संबंध में विद्याधर के अग्रज भ्राता(महावीर प्रसाद जी)ने बताया-


विद्याधर घर वालों को मच्छर भगाने के लिए धुआं नहीं करने देता था, और खटमल मारने की दवाई भी नहीं छिड़कने देता था-  "कि इससे जीव हिंसा होगी, पाप लगेगा, वो भी तो जीना चाहते हैं।" तब उसको हम लोग कहते- वो अपने को काटेंगे, तो कहता- "अपन मरेंगे नहीं।” इसी तरह मुझको फसल पर पंप से पाउडर छिड़कने के लिए मना करता था।कहता- "पाप लगता है, ऐसी खेती ही क्यों करो। केवल गन्ना की खेती करना चाहिए।" पिताजी उसकी भावनाओं को देखते हुए खेत पर नहीं भेजते थे या कम भेजते थे। उससे खेती का कोई कार्य नहीं कराते थे। "जब भी खेत पर विद्याधर जाता था तो मात्र बैठा रहता था। साथ में धर्म की पुस्तक ले जा कर पढ़ता रहता था। "एक बार हमने उसको खेत पर भेजा तो वहां पर जाकर बैठ गया और कुछ देर बाद वापस आ गया। मैंने शाम को पूछा- "खेत पर गए थे क्या देखा ? तो बोला- मजदूर काम कर रहे थे। " हमने पूछा कितने लोग थे ? तो बोला- "12 थे। "हमने पूछा-कितनी महिलाएं, कितने पुरुष थे ? तो बोला- "मुझे नहीं मालूम। " हमने कहा-उनको अलग अलग मजदूरी देना पड़ती है । तो "विद्याधर बोला- काम तो सभी बराबर करते हैं ना, तो मजदूरी भी सबको बराबर देनी चाहिए। "तब मुझे गुस्सा आया उस पर, तो नाराज होकर मौन से बाहर निकल गया। जवाब नहीं देता था, कभी किसी को उल्टा। इस तरह करुण हृदयी विद्याधर आज अहिंसा महाव्रत का पालन कर, प्राणी मात्र के सच्चे मित्र बन गए हैं। अहिंसा महाव्रतियों के चरणों में नमोस्तु करता हुआ.......
 

अन्तर्यात्री महापुरुष पुस्तक से साभार

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