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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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परीषयजयी साहसी विद्याधर - 84 वां स्वर्णिम संस्मरण


सदेह में विदेह भोक्ता गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को मेरा कोटि कोटि वंदन......
हे गुरुवर!आज मैं आपको वह घटना याद करा रहा हूं जिससे आप कुछ विचलित सेे हुए थे किंतु विद्याधर जी के जवाब से आपके हर्षाश्रु आ गए थे, जिसे आप सहजता से छुपा दिए थे और रात भर आशीर्वाद देते रहे होंगे तो लाडले ब्रह्मचारी सुबह हंसते हुए मिले थे, जिसको किशनगढ़ के वो लोग आज तक नहीं भूले। जो उसके साक्षी थे। इस संबंध में शांतिलाल गोधा जी(आवड़ा वाले) मदनगंज किशनगढ़ से लिखते हैं-


"सन 1967 मदनगंज किशनगढ़ चातुर्मास के दौरान एक दिन रात्रि में ब्रह्मचारी विद्याधर जी को बिच्छू ने काट लिया" तब ज्ञान सागर जी महाराज ने समाज के व्यक्तियों को शीघ्र उपचार करने के लिए कहा। तत्काल एक वैद्य को बुलाया गया, तब विद्याधर जी ने उपचार के लिए मना कर दिया। समाज के सारे लोगों की चिंता बढ़ गई। उनकी तकलीफ को देख सभी उन्हें मनाते रहे। प्रमुख लोगों ने पूछा- "आप मना क्यों कर रहे हो ? तो ब्रह्मचारी विद्याधर जी बोले-मुझे मुनि बनना है तब कैसे सहन करूंगा ?" और बिना उपचार के ही चटाई पर लेट गए, पीड़ा को सहन करते रहे। हम सभी लोग अन्यमनस्क हो, तरह-तरह की शंकाएं लेकर गुरुजी के पास गए थे, सुनकर उनके मुख पर गर्वोन्मुक्त मंद मुस्कान फैल गई और फिर हम लोग घर वापस चले गए। दूसरे दिन सुबह जब समाज के लोग पहुंचे तब ज्ञान सागर जी महाराज को सारी बात बतलाई तो ज्ञान सागर जी महाराज ने विद्याधर जी को बुलाया और पूछा-"स्वास्थ्य कैसा है?" तो विद्याधर जी हंसते हुए बोले-"आप के आशीर्वाद से बिल्कुल ठीक हूं। यह सुनकर गुरु महाराज प्रसन्न हो गए और हम सभी विद्याधर जी की ऐसी उत्कृष्ट साधना देखकर हतप्रभ रह गए।


इस तरह विद्याधर जी मुनि बनने की उत्कृष्ट भावना लेकर साधना में लीन थे जिससे उनकी साहस एवं सहनशीलता का परिचय मिलता है ऐसे श्रेष्ठ साधक के ब्रह्मचारी को पाकर आप भी गौरवान्वित हुए होंगे। आपके गौरव को प्रणाम करता हुआ हूं। मुझमें भी ऐसी सहनशक्ति प्रगट हो इस भावना के साथ.......
             

अन्तर्यात्री महापुरुष पुस्तक से साभार

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