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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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महावीर प्रभु समान जीवंत चर्या - 73 वां स्वर्णिम संस्मरण


गुरु जी का उपदेश चल रहा था, हम सभी साधक उस उपदेशामृत का पान कर रहे थे। आचार्य श्री ने बताया कि- समय अनुसार हमें कभी कठोर तो कभी मृदु चर्या के माध्यम से साधना विकास उन्मुखी बनाना चाहिए। लेकिन तेज सर्दी और तेज गर्मी में साधना करना बहुत मुश्किल है आज खुले में साधना करने वालों के दर्शन दुर्लभ है। तब मैंने कहा- आचार्य श्री जी मैंने सुना है पहले आप, जब राजस्थान में थे तब खुले में पहाड़, श्मशान आदि पर जाकर साधना करते थे यह सुनकर आचार्य श्री जी कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले - केकड़ी राजस्थान के पास बघेरा गांव है जहां शांतिनाथ भगवान का मंदिर है,वहां से 1 किलोमीटर दूरी पर पहाड़ है, गांव में आहार चर्या करके सीधे ही पहाड़ पर चले जाते थे,वहां पर उस समय गर्मी का मौसम था को गर्म गर्म हवा चलती थी। बड़े-बड़े पत्थर थे,  उन पत्थरों की ओट में आकर बैठ जाते थे।उस समय साथ में क्षुल्लक मणिभद्र जीभी थे, उनकी आंखों में गर्म हवा की वजह से जलन होती थी तो उन्हे बताया कि आप पहले दुपट्टे को कमण्डलु के पानी में मिलाकर के आंखों पर रख लिया करो। रात्रि विश्राम भी वही एक गुफा में करते थे।

 

हंस कर बोले - एक बार पहाड़ पर ज्यादा ऊपर चढ़ गए फिर रास्ता भटक गए, नीचे उतरते वक्त हाथ पकड़कर कमंडलु पत्थरों से टिकाते-टिकाते नीचे उतर आए। कभी-कभी श्मशान में चले जाते थे।वहां एक छतरी जैसी बनी थी वही रात्रि व्यतीत करते थे।कभी कभी नदी की रेत में रात्रि विश्राम हो जाता था। शिष्य ने पूछा- आचार्य श्री जी! रेत तो गरम रहती होगी। आचार्य श्री जी ने कहा- हाँ देर रात होने पर थोड़ी ठंडी हो जाती थी। शिष्य ने पूछा-आचार्य श्री जी! आप वहां दिन रात क्या करते थे। तब आचार्य श्री जी बोले-सामायिक स्वाध्याय(समयसार,पंचास्तिकाय,प्रवचनसार आदि) करते थे।

 

शिष्य ने पूण: शंका व्यक्त करते हुए कहा-क्या आप ये ग्रंथ साथ में ले जाते थे ? आचार्य श्री जी ने कहा- नहीं, मौखिक(याद)था सब कुछ, पुस्तक की क्या आवश्यकता। यह हैं गुरुदेव की अद्भुत चर्या का जीवंत उदाहरण।

ग्रीष्मकाल में आग बरसती गिरि शिखरों पर रहते हैं।
वर्षा ऋतु में कठिन परीषय तरु तल रहकर सहते हैं।।

 

तथा शिशिर हेमंत काल में बाहर भू पर सोते हैं।
वंद्य साधु ये वंदन करता, दुर्लभ दर्शन होते हैं।।


यह पंक्तियां आचार्य श्री जी ने योगी भक्ति का हिंदी अनुवाद करते हुई लिखी हैं। सच है वह जो लिखते हैं पहले स्वयं जीवन में लख लेते हैं। वे मात्र उपदेश ही नहीं देते बल्कि उस उपदेश को अक्षरश: अपने जीवन में उतार लेते हैं। यह है उनकी साधना के कुछ क्षण। हे गुरुदेव!ये क्षण हम सभी को भी प्राप्त हो ताकि हम लोग भी ऐसी साधना को उपलब्ध कर सके।।

अनुभूत रास्ता पुस्तक से साभार

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