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संदेह होगा - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू २

haiku (2).jpg

 

संदेह होगा,

देह है तो, देहाती !

विदेह हो जा |

 

हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है।

 

आओ करे हायकू स्वाध्याय

  • आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं।
  • आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं।
  • आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं।

लिखिए हमे आपके विचार

  • क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं।
  • इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?

 



6 Comments


Recommended Comments

हे आत्मन यदि देह में स्थित हो तो निश्चित रूप से पल पल संदेह तुम्हे घेरेगा इसीलिए निज के अमूर्त स्वरुप में स्थित होकर विदेही बन जाओ

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कोटिशः नमोस्तु गुरुदेव को। 

अर्थ-जब तक इस देह में रहोगे भटकन, दुख, संताप बने रहेंगे। देह में रमने वाले अगर चिर आनंद चाहिये तो ऐसा जतन कर देह के चक्कर से पीछा छूट जाये।

गुरुदेव के श्री चरणों मे मेरा एक हाइकू समर्पित है-


और अधिक
अब और कितना
अंतहीन है।

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संदेह आदि अविद्या और अज्ञान देहाभिमान से ही उत्पन्न होता है I इसलिए देह के बंधनों से मुक्त होकर विदेह बन जाओ I सतत संतोष में रहो! 

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देह

108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चरणों में सत-सत नमन-वंदन, नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु गुरुवर ???

 

संसार के 

सब बंधनो के

मोह-माया 

जाल से 

 

प्राणी सदा

बेचैन  रहता 

मान खुद को

देहमय 

 

भ्रम में 

सदा रहता

भटकता, भूल

निज आत्मा

 

अब

समय है

चेत जा, ध्या 

अनित्य भावना 

 

अशरणमय 

इस जगत में 

स्व-आत्मा ही

शुभ शरण है

 

दुखमयि

सुख आभासी

जगत की

छणिक निधियाँ

 

चाह प्राणी

त्याग दे

गुरु चरण में 

शीश धरकर 

 

आत्म कल्याण

की शुभ राह

ले, मोक्ष रूपी

लक्ष्मी वर ले

 

देह से विदेह जा

प्रभु भक्ति वश 

आत्मा के सुरमयि 

स-हृदय गीत गा।।

 

सविनय नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु गुरुवर 

अभिषेक जैन सा-परिवार 

 

 

 

 

 

 

 

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जीव अरुपी और ज्ञानमय है शरीर रुपी और जड़ है। मिथ्यातवी हमेशा यही मानता है कि जीव और देह एक ही है। लेकिन जैसे जैसे जीव का उपयोग अशुभ से शुभ की और परिनमन करता है तो सन्देह होता है जीव और काया के एकरूप पर धीरे-धीरे सन्देह के बादल छँट जाते है और जो देह देहाती लगती है वो विदेशी अथार्थ पराई दिखने लगती है। अब देह से मोह छूट कर भीतर की और दृष्टि होने लगी है। जीव का लक्षण उपओग है। वह निरन्तर अशुभ , शुभ और शुद्ध रुप से परिनमन करता है। कहना न होगा अब विदेह हो जा अथार्थ देह से परे शुभ उपयोग मे समय बिता जो शुद्ध उपयोग मे परिवर्तित हो जाए।

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