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जुड़ो ना जोड़ो - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू १‍

संयम स्वर्ण महोत्सव

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Haiku (1).jpg

 

जुड़ो ना जोड़ो,

जोड़ा छोड़ो जोड़ो तो,

बेजोड़ जोड़ो।

हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है।

 

आओ करे हायकू स्वाध्याय

  • आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं
  • आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं
  • आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं

लिखिए हमे आपके विचार

  • क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं
  • इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?


10 Comments


Recommended Comments

न किसी से ममत्व रखो न किसी को स्वयं से ममत्व रखने दो, जिससे ममत्व है उसे छोड़ो और स्वयं से जुडो और इस प्रकार जुडो की अलग न हो पाओ

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जय हो गुरुदेव की। 

अर्थ-न किसी से राग रखिये न किसी को ख़ुद से राग रखने दीजिये। अगर किसी से कोई राग है तो  त्याग दें। राग अगर करना ही है तो वीतरागी प्रभुु से करो।

 

एक मेरा हाइकु गुरुदेव के श्री चरणों में-

रब यहीं है
और कहाँ क्यों जाना
तुझमें ही है।

 

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मोह मत करो,प्रेम करो।

राग और मोह को त्याग,

निस्वार्थ प्रेम और वात्सल्य का भाव रखो।

इस प्रेम और वात्सल्य के भाव को स्थाई और  अटूट बनाये रखो।

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नमोस्तु गुरूवर,? इसमें  कहा है कि अपनेअंतरग से जुड़जाओ वहिरंग कोछोड़ दो जो संसार जुड़ाहै उसे छोड़ कर ऐसा वेजोड़ अन्तरात्मा से जुड़ जाओ कि किसी जुड़ने जोड़ने का विकल्प ही समाप्त हो जाये।

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मोह से,राग से जुडो ना,वीतरागता से नाता जोडो,
जो अबतक जोडा है कषायोंको उसे छोडो,
और
रत्नत्रय को ,सम्यक्त्व को धारण कर, मुनीपद से ऐसा जुडो कि आखिर तक सिध्दपद पानेतक ये हमारा साथ ना छोडे,ऐसे बेजोड जोडो.??????
*सौ.सुखदा अजितकुमार कोठारी*गुलबर्गा ,कर्नाटक*

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हम जब तक स्वयं समर्थ नही हो जाते तब तक हम श्री जी का सहारा लेते हैं भव सागर से पार होने के लिये सो श्री जी से जुडो न जोड़ो सांसारिक बंधनो को और अगर जोड़ा है तो छोड़ो ।और जोड़ना है तो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र को जोड़ो जो बेजोड़ है।

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इस haiku के माध्यम से आचार्य श्री जी हमको यह समझाना चाहते है कि  हमको पुदगल पदार्थो के प्रति अपने राग द्वेष को छोड़ना है और अपने आत्म  स्वभाव से जुड़ना है । और इस प्रकार जुड़ना है जब तक हमको मुक्ति ना मिले तब तक हम अपने आत्म स्वभाव से जुड़े रहे ताकि हमको  हमारे जन्म - मरण से मुक्ति मिल सके। 

Edited by Sakshi Soni Jain

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हे भव्य जीव तुम इस नशवर संसार को ग्रहण ना करो  ओर ना ही ऐसे  कर्म करो की बार बार यह भव फिर से मिले   और जिन  कर्मो  के कारण् यह जीव बार बार जन्म मरण को धारण करता  हे उसका तयाग करें ओर ऐसे कर्मो को करें कि मोक्ष को पाये ओर दुबारा जन्म ना हो

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