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हँसो-हँसाओ - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू ३५९

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संयम स्वर्ण महोत्सव

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Haiku (359).jpg

 

 

हँसो-हँसाओ,

हँसी किसी की नहीं,

इतिहास हो।

 

हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है।

 

आओ करे हायकू स्वाध्याय

  • आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं
  • आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं
  • आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं

लिखिए हमे आपके विचार

  • क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं
  • इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
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हँसना शब्द चेहरे की मुस्कान या खिलखिला ती हसीं की और  ध्यान आकर्षित करता है। हसो अथार्थ सभी दुख और सुख को श्रनिक मान कर समता भाव मे लीन हो जाओ ।अपनी आत्मा के स्वरूप को पहचान लेने पर चेहरे पर स्वत ही हसीं खिल उठती है। अपने से जुडे हर प्राणी को राग द्वेष के तीव्र परिणामो से बचाने का प्रयास ही उनके जीवन को आत्मिक सुख की और  ले जाने मे सहायक बन सकता है। यही तो है सभी को हंसाना। ऐसे ही प्रयासो को याद रखा भी जाता है और याद किया भी जाता है। क्योकि आमतौर से मनुष्य अपने ही ताने बाने में इतना उलझा रहता है कि जिस पत्थर से राह पर ठोकर लगती है वह तक एक तरफ रखने की उस को फुर्सत नही होती। ऐसे मे किसी की आंखो के आंसू पोंछ कर चेहरे पर मुसकान सजा देने से बडी कोई मानवता नही है। धरम को जीवन में उतार लेने से ही किसी के दुख के प्रति स्वेद्ना जागृत हो सकती है। वेसे भी हसीं किसी की जागीर नही है इस पर तो सभी का समान अधिकार है परंतु अज्ञानता वश सभी इस अधिकार का ठीक से उपयोग और प्रयोग नही कर पाते। और जो करते हैं वो इतिहास मे अमर हो जाते हैं।

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