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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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उपाधि - संस्मरण क्रमांक 26


संयम स्वर्ण महोत्सव

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 ☀☀ संस्मरण क्रमांक 26☀☀
           ? उपाधि ?
सागर में आचार्य महाराज के सानिध्य में पहली बार षट्खंडागम वाचन-शिविर आयोजित हुआ। सभी के खूब रुचि ली। लगभग सभी वयोवृद्ध औऱ मर्मज्ञ विद्वान आए। जिन महान ग्रन्थों को आज तक दूर से ही माथा झुकाकर अपनी श्रद्धा सभी ने व्यक्त की थी , आज उन पवित्र ग्रथों को छूने ,देखने, पढ़ने और सुनने का सौभाग्य मिला। यह जीवन की अपूर्व उपलब्धि थी।
वाचना की समापन  बेला में सभी विद्वानों के परामर्श से नगर में प्रतिष्ठित एवं प्रबुद्ध नागरिकों के एक प्रतिनिधि मंडल ने आचार्य महाराज के श्री-चरणों मे निवेदन किया कि समुचे समाज की भावनाओं को देखते हुए आप चारित्र-चक्रवर्ती पद को आप धारण करके हमे अनुगृहीत करे। सभी लोगो ने करतल ध्वनि के साथ अपना हर्ष व्यक्त किया । ☀आचार्य महाराज मौन रहे।☀ कोई प्रतिक्रिया तत्काल व्यक्त नही की।

थोड़ी देर बाद आचार्य महाराज का प्रवचन प्रारम्भ हुआ,और प्रवचन के अंत मे उन्होंने कहा, "पद-पद पर बहुपद मिलते है , पर वे दुख-पद आस्पद है। प्रेय यही बस एक निज-पद सकल गुणों का आस्पद है।" आप सभी मुझे मुक्ति-पथ पर आगे बढ़ने दे और इन सभी पदों से मुक्त रखे। आप सभी के लिए मेरा यही आदेश, उपदेश, और संदेश है।
सभा में सन्नाटा छा गया। सभी की आँखे पद के प्रति आचार्य महाराज की निस्पृहता देखकर हर्ष व विस्मय में भीग गई।

शिक्षा- सच मे आचार्य भगवन कभी भी किसी सम्मान या उपाधि को स्वीकार नही करते, हमेशा इस सब से दूर रहते है, वैसे ही हमे भी अपने कर्तव्य को करते रहना चाहिए, कभी किसी सम्मान की चाह नहीं रखना चाहिए।

सागर(अप्रैल1980)
? आत्मान्वेषी पुस्तक से साभार?
? मुनि श्री क्षमासागर जी महाराज
 

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