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साधना छोड़ - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू १‍७१‍


संयम स्वर्ण महोत्सव

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Haiku (171).jpg


साधना छोड़,

काय-रत होना ही,

कायरता है।

 

हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है।

 

आओ करे हायकू स्वाध्याय

  • आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं
  • आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं
  • आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं

लिखिए हमे आपके विचार

  • क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं
  • इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?

1 Comment


Recommended Comments

साधना यु ही तो नही की जाती है। हो सकता है कि बहुत से भवो के संचित पुनय कर्म हमे साधना की और ले जाये या फिर एक दो भव की गहरी आस्था और भगति ही वर्तमान मे साधना के लिये प्रेरित करे। कौन जानता है आत्मा के भीतरी प्रकोष्ठ मे क्या अंकित है। समय आने पर भाग्य उदय होता है। और ये चंचल मन साधना की और उन्मुख होता है। संसार मे आटे में नमक के समान मात्रा है साधको की।जाहिर सी बात है संसार के आकर्षण से विरले ही बच पाते है। ऐसे मे साधना के लिये कड़े अभ्यास की जरुरत होती है। जल्दबाजी हर क्षेत्र मे बुरी होती है। साधना के क्षेत्र में भी ऐसा ही है। स्वाभाविक है कि तैयारी यदि अधुरी है तो आप साधना के क्षेत्र में ज्यादा समय टिक नही पाय गे। भीतर की और दृष्टि और इन्द्रियो का सयम  का निरन्तर अभ्यास ही साधना की और पहला कदम है। साधना का अर्थ है मोक्ष सुख ,निरन्तर सुख, अकल्पनीय सुख,श्ब्दातित सुख।लेकिन साधक को ये एक ही बार के अभ्यास से नही मिलता लम्बे और कड़े अभ्यास से ही ये सम्भव है। लेकिन मानव दुर्बलता और इच्छाओ से भरा पुंज है। इतना जल्दी और आसानी से संसार छोड़ना नही चाहता। थोडी सी विपरित परिस्थितयों का सामना होते ही देह सुख की और लौट जाना ही तो अभ्यास की कमी है। प्राकृतिक विपरित परिस्थितय और त्रियंच या देव परिषय से घबरा कर कोई कायर हि तो अपनी नश्वर देह की सुरक्षा के लिये मोक्ष सुख प्रदाता साधना को छोड देने की सोचेगा

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