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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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अभयदान - संस्मरण क्रमांक 8


संयम स्वर्ण महोत्सव

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   ☀☀ संस्मरण क्रमांक 8☀☀
           ? अभयदान?


 चातुर्मास स्थापना का समय समीप आ गया था, सभी की भावना थी कि इस बार आचार्य महाराज नैनागिरी में ही वर्षाकाल व्यतीत करें,वैसे
नैनागिरी के आसपास डाकुओं का भय बना रहता है, पर लोगों को विश्वास था कि आचार्य महाराज के रहने से सब काम निर्भयता से सानंद संपन्न होंगे सभी की भावना साकार हुई चातुर्मास की स्थापना हो गई।
एक दिन हमेशा की तरह है जब आसान महाराज आहारचर्या से लौटकर पर्वत की ओर जा रहे थे तब रास्ते में समीप की जंगल से निकलकर चार डाकू उनके पीछे-पीछे पर्वत की ओर बढ़ने लगे सभी के मुख वस्त्रों से ढके थे हाथ में बंदूकें थी। लोगों को थोड़ा भय लगा, पर आचार्य महाराज सहज भाव से आगे बढ़ते गए ,मंदिर में पहुंचकर दर्शन के उपरांत सभी लोग बैठ गए,आचार्य महाराज के मुख पर बिखरी मुस्कान और सब और फैली निर्भयता व आत्मीयता देखकर वह डाकुओं का दल चकित हुआ। सभी ने बंदूके  उतार कर एक तरफ रख दीं, और आचार्य महाराज की शांत मुद्रा के समक्ष नतमस्तक हो गए *आचार्य महाराज में आशीष देते हुए कहा कि- निर्भय होओ,और सभी लोगों को निर्भर करो,हम यहां 4 माह रहेंगे।चाहो तो सच्चाई के मार्ग पर चल सकते हो। वह सब सुनते रहे और फिर झुक कर विनय भाव से प्रणाम करके धीरे-धीरे लौट गए। उन डाकुओं ने आचार्य महाराज को वचन दिया कि महाराज आप निश्चिंत रहिए हमारे रहते आपके भक्तों की एक सुई भी नहीं गुम सकतीयह हमारा आपसे वादा हैफिर वहां किसी के साथ कोई दुर्घटना नहीं हुई और चातुर्मास में प्रवचन के समय वे डाकू भी अपना वेश बदलकर आचार्य श्री जी के प्रवचन सुनने के लिए आते थे 
फिर लोगों को नैनागिरी आने में जरा भी भय नहीं लगा, वहां किसी के साथ कोई दुर्घटना भी नहीं हुई, इस प्रकार आचार्य महाराज की छाया में सभी को अभय दान मिला।
हमारा सौभाग्य है की ऐसे आचार्य महाराज की चरणों की छत्रच्छाया के नीचे हमें अपना जीवन निर्माण करने का अद्वितीय सौभाग्य मिला।
☀नैनागिरी 1978 ☀
आत्मान्वेषी पुस्तक से साभार
  ? मुनि क्षमासागर जी महाराज
 प्रस्तुतिकर्ता -  नरेन्द्र जबेरा (सांगानेर) 8005626148
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