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✍परम पूज्य आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज ससंघ एवं शिष्य पूज्य मुनिश्री समतासागर जी महाराज ससंघ के मंगल मिलन पर अभिव्यक्ति

 

विद्या गुरु के श्री चरण
समता निश्चय आन
विद्या पुष्प वाटिका में
ये सुरभित हो जान
🌈🌈

रेवा के तट सिद्धोदय
विद्या के दरवेश
नेमावर की वसुधा पर
पिच्छी द्वय प्रवेश

 

16 वर्ष बाट जोहते
वो समता धारी
अब गुरु चरणों में मिले
दृढ़ निश्चय धारी

 

जब नैनो के सामने
गुरु विद्या से देव
दूजो कछु नही लखत है
मन वच काय हों एक

 

संयम स्वर्णिम वर्ष है
स्वर्णिम गुरु दरबार
गुरु दर्श पद प्रक्षाल कर
हर्ष अश्रु की धार

 

✍ पुष्पेन्द्र जैन नैनधरा सागर

 

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व्यवस्था ही है ऐसी
युगों युगों से
इस संसार की
जो बड़ो की कृपा से ही
चलती है जीवन रूपी गाड़ी
सबकी ....
कौन मानता है उस कृपा को
ये होती हर एक की
अपनी अपनी समझदारी
कृतज्ञता के भाव
होते जिसके मन में
उसके जीवन में
बनी रहती प्रगति
और
जो करता उनकी अनदेखी
नहीं मिलती उसे
सफलता जल्दी ....
समयबद्ध होकर
जो चलता अपनी जीवन प्रणाली
उसे ही मिलती अधिक राशि
जैसे फिक्स्ड डिपाजिट पर
मिलता ब्याज अधिक ही
जितने लंबे समय के लिए
करते फिक्स्ड डिपाजिट
उतनी अधिक मिलती धनराशि
इसी प्रकार
जो समयबद्ध होकर
रखता / बनाता
अपना हिसाब
उसको निरंतर मिलता रहता
उसका लाभ
चाहे नहीं भी होती वो धनराशि
उसके हाथ में / संग में
लाभ तो गुणित होकर
मिल ही रहा होता
उसे अबाधित ...
जब आता
आता इतना
नहीं मिलती जगह
उसे रखने की
इसी प्रकार जानो
संबंध को गुरु-शिष्य के
चाहे होते दूर शिष्य
अपने गुरु से
व्यवस्था गुरु की
बनी हुए होती ऐसी
जो पहुँच रहा होता लाभ
निरंतर उसके पास में
अबाधित
बस,
समयबद्ध होकर
करता रहे
शिष्य क्रियाएं अपनी ....
प्रणाम !
अनिल जैन "राजधनी"
श्रुत संवर्धक
२.१२.२०१९

 

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मम गुरुवर
आचार्यश्री विद्यासागर
जो रखते है सबकी खबर
बिना उठाये
मन में कोई विकल्प
अरे !मात्र जीव के
कल्याण की ही नहीं
वो सोचते
वो तो करते बात
मानव मात्र के उत्थान की
उनके हित की
उनके जीवन यापन की
उनके ज्ञान-ध्यान की
उनकी शिक्षा - दीक्षा की
इस कलिकाल के है
वो साक्षात् ऋषभ
जिन्होंने सिखा दिया
कर्तव्य निष्ठापन
एक गृहस्थ को
कैसे करे वो
स्वाभिमानी रहकर
स्वाधीन बनने का उद्यम
इसीलिए बता दिए उन्हें
हथकरघा जैसे उद्यम
अथवा कृषि के या उनसे बने
उत्पादकों के कार्यक्रम
निसंकोच होकर
करो अडॉप्ट
नौकरी नहीं
तुम खुद दोगे रोजगार
नहीं बनोगे पराधीन
कर सकोगे धर्मध्यान
अपनी सुविधानुसार
बना रहेगा जिससे
तुम्हारा धर्म मार्ग प्रशस्त ...
नमोस्तु गुरुवर !
अनिल जैन "राजधानी"
श्रुत संवर्धक
२.१२.२०१९

 

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8 minutes ago, anil jain "rajdhani" said:

व्यवस्था ही है ऐसी
युगों युगों से
इस संसार की
जो बड़ो की कृपा से ही
चलती है जीवन रूपी गाड़ी
सबकी ....
कौन मानता है उस कृपा को
ये होती हर एक की
अपनी अपनी समझदारी
कृतज्ञता के भाव
होते जिसके मन में
उसके जीवन में
बनी रहती प्रगति
और
जो करता उनकी अनदेखी
नहीं मिलती उसे
सफलता जल्दी ....
समयबद्ध होकर
जो चलता अपनी जीवन प्रणाली
उसे ही मिलती अधिक राशि
जैसे फिक्स्ड डिपाजिट पर
मिलता ब्याज अधिक ही
जितने लंबे समय के लिए
करते फिक्स्ड डिपाजिट
उतनी अधिक मिलती धनराशि
इसी प्रकार
जो समयबद्ध होकर
रखता / बनाता
अपना हिसाब
उसको निरंतर मिलता रहता
उसका लाभ
चाहे नहीं भी होती वो धनराशि
उसके हाथ में / संग में
लाभ तो गुणित होकर
मिल ही रहा होता
उसे अबाधित ...
जब आता
आता इतना
नहीं मिलती जगह
उसे रखने की
इसी प्रकार जानो
संबंध को गुरु-शिष्य के
चाहे होते दूर शिष्य
अपने गुरु से
व्यवस्था गुरु की
बनी हुए होती ऐसी
जो पहुँच रहा होता लाभ
निरंतर उसके पास में
अबाधित
बस,
समयबद्ध होकर
करता रहे
शिष्य क्रियाएं अपनी ....
प्रणाम !
अनिल जैन "राजधनी"
श्रुत संवर्धक
२.१२.२०१९

 

 

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