Jump to content
मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
  • entries
    108
  • comments
    3
  • views
    18,395

Contributors to this blog

आदर्श ग्रहस्थ - संस्मरण क्रमांक 5


संयम स्वर्ण महोत्सव

210 views

 Share

???????????
??? संस्मरण क्रमांक 5 ???
       ?? आदर्श ग्रहस्थ ??
आचार्यश्रीजी गृहस्थ धर्म की व्याख्या कर रहे थे उन्होंने बताया कि - गृहस्थ रागी जरुर होता है,किंतु वीतरागी का उपासक अवश्य होता है।सच्चा श्रावक हमेशा देव,शास्त्र व गुरु पर समर्पित रहता है। देव पूजा आदि छः आवश्यकों का प्रतिदिन पालन करता है। पर्व के दिनों में एकाशन करता हुआ ब्रह्मचर्य का पालन करता है।जिसके माध्यम से संकल्पी हिंसा होती हो ऐसा व्यापार नहीं करता। उसका आजीविका का साधन न्याय-संगत एवं सात्विक होता है। वह विवाह भी करता है तो वासना की पूर्ति के लिए नहीं बल्कि कुल परम्परा चलाने के लिए करता है। वह संसार कीचड़ में रहता तो है लेकिन रचता-पचता नहीं है।तब मैंने कहा कि-आचार्यश्री जी आज ऐसा गृहस्थ मिलना मुश्किल है और यदि मिल भी जाए तो उसके सारे परिवार का कल्याण हो जाए। तब आचार्य श्री जी ने कहा कि-सच बात तो यह है कि एक आदर्श गृहस्थ उस नाविक की तरह है जो स्वयं तैरते हुए अन्य सभी परिवार रुपी नाव के आश्रित जनों को पार ले जाता है।
दिशा बोध से साभार
???????????
       समस्त स्वर्णिमसंस्मरण परिवार 
???????????

 Share

0 Comments


Recommended Comments

There are no comments to display.

Create an account or sign in to comment

You need to be a member in order to leave a comment

Create an account

Sign up for a new account in our community. It's easy!

Register a new account

Sign in

Already have an account? Sign in here.

Sign In Now
  • बने सदस्य वेबसाइट के

    इस वेबसाइट के निशुल्क सदस्य आप गूगल, फेसबुक से लॉग इन कर बन सकते हैं 

    आचार्य श्री विद्यासागर मोबाइल एप्प डाउनलोड करें |

    डाउनलोड करने ले लिए यह लिंक खोले https://vidyasagar.guru/app/ 

×
×
  • Create New...