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आलोचन से - आचार्य विद्यासागर जी द्वारा रचित हायकू ७४

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संयम स्वर्ण महोत्सव

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haiku (74).jpg

 

आलोचन से,

लोचन खुलते हैं,

सो स्वागत है।

 

हायकू जापानी छंद की कविता है इसमें पहली पंक्ति में 5 अक्षर, दूसरी पंक्ति में 7 अक्षर, तीसरी पंक्ति में 5 अक्षर है। यह संक्षेप में सार गर्भित बहु अर्थ को प्रकट करने वाली है।

 

आओ करे हायकू स्वाध्याय

  • आप इस हायकू का अर्थ लिख सकते हैं
  • आप इसका अर्थ उदाहरण से भी समझा सकते हैं
  • आप इस हायकू का चित्र बना सकते हैं

लिखिए हमे आपके विचार

  • क्या इस हायकू में आपके अनुभव झलकते हैं
  • इसके माध्यम से हम अपना जीवन चरित्र कैसे उत्कर्ष बना सकते हैं ?
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2 Comments


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हर घटना और सभी बातो के दो पहलु होते हैं एक अच्छा और दुसरा बुरा ।
आम तौर से संसारिक मनुष्य आलोचना से बुरा मान जाता है। किन्तु साधना के पथ पर भीतरी और बाहरी दोनो ही प्रकारकी आलोचला साधक के जीवन को निखार कर और अधिक उज्जवल बनाती है। यदि लोगों द्वारा की गई है तो जीवन में सकारात्मकता और साधना के प्रति दृढता को बढाती है और भीतर से गल्तियों की आलोचना होती है तो वह दृष्टिकोण को निखार देती है जो भीतरी लोचन जिसे आम भाषा मे तीसरा नेत्र कहते हैं को खोल देने मे सहायक बनती है। सो आलोचना का साधक अपने जीवन में स्वागत करता है जीवन मे और साधना मे निखार लाने के लिये।

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संत शिरोमणि आचार्य भगवन ससंघके पावन चर

 

णों में कोटि कोटि नमन्। पहली लाइन  *आलोच

क ही  ।  दूसरी लाइन  *सच्चा पथ लोचन ।तीसरी लाइन  *सो करता है। 

 

 

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