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आज पुराना साल जा रहा है तो क्या हिंदी तिथि से- नही बल्कि पश्चिमी कलेंडर की तारीख से पुराना वर्ष विदाई ले रहा है

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shrish singhai

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आज पुराना साल जा रहा है तो क्या हिंदी तिथि से- नही बल्कि पश्चिमी कलेंडर की तारीख से पुराना वर्ष विदाई ले रहा है और कल नया वर्ष आ रहा है लोग धडाधड एक दूसरे को बधाई दिये जा रहे है क्योंकि उन्हें भी कुछ हद तक हवा लगी हुई है और उसका बिशेष कारण है हमारे देश में भारतीय परंपराओ का संचालन करने वाली गुरुकुल पद्वति की पढ़ाई अब कान्वेंट की कोएडुकेशन ने जो ले ली है
                    हमारे मंदिरों में पढ़ाई जाने वाली शिक्षाएं भी जिन्हें पाठशाला के रूप में सुबह शाम संचालित किया जाता था अब नए जमाने के रंग में कम सी होती जा रही है लोगो को चिंता इस बात की तो है कि जैन अल्पसंख्यक है और उसमें भी मंदिरों मे संख्या और और कम होती जा रही है लेकिन कोई इस ओर सकारात्मक कदम ना तो उठा रहा है और ना ही सोच रहा है कि आने वाली नयी पीढ़ी को मन्दिर और पाठशाला से कैसे जोड़ा जाए
                    लेकिन इन सब से दूर एक संत ऐसे भी है जिन्हें चिंता हुई तो उन्होंने प्रयास भी शुरू किए और मंदिरों से विमुख होते युवाओ को शांतिधारा के माध्यम से भगवान के नजदीक लाकर खड़ा कर दिया जिसके परिणाम स्वरूप कल प्रातः उन जिनालयों में विशेष रूप से  शांतिधारा का विशाल आयोजन किया जा रहा है जहाँ जहाँ मुनि श्री की प्रेरणा से इस परंपरा की शुरुआत हुई है फिर वे चाहे मध्यप्रदेश, बुंदेलखंड या राजस्थान में बने मन्दिर या तीर्थ क्षेत्र हो,, यदि हम जाकर देखेंगे तो पायँगे कि 75 फीसदी संख्या युवाओ की ही होती है जो नयी पीढ़ी को आगे ले जाने वाले है
              अभी कुछ वर्षों पहिले मुनिश्री की प्रेरणा से कई सारे स्कूल एक चैन सिस्टम को लेकर शुरू किए गए है जिनमे भी शिक्षा के सुधरते स्तर का प्रभाव है कि बच्चे अपने माँ बाप को लेकर मन्दिरजी जाने की बात करते नजर आते है और मात्र नजर ही नही आते बल्कि लेकर भी जाते है
               अभी दो तीन दिन पहिले मुनिश्रेष्ठ ने पाठशालाओं के स्तर को भी किसी मॉर्डन इंग्लिश मीडियम स्कूल से भी बेहतर और डिजिटल युक्त करने की सलाह दी है बच्चों को लाने और ले जाने के लिये विकल्प रूप वाहन जो कि सभी सुविधाओं से युक्त हो जिसमें एक व्यक्ति जिम्मेदारी से बच्चों को सुरक्षित लाने और छोड़कर आने की जबाबदारी के साथ हो।,,, क्योंकि ऐसा करने से हम बच्चों की रुचि पूर्वक उन्हें धर्म की शिक्षा सुरक्षित माध्यम में प्रदान कर सकते है तर्क यह है कि जिस माध्यम से हमारे आदर्श रूप शिक्षा पद्वति में जहर घोला जा रहा है हम भी उसी को माध्यम बना कर अमृत क्यों ना घोले
           सकारात्मक सोच और संस्कृति की रक्षा की सोच रखने वाले संत श्रेस्ठ मुनि पुंगव सुधासागर जी महाराज सदा जयवंत हो

श्रीश ललितपुर

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