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आचार्य श्री ने किया निर्यापक व्यवस्था का उल्लेख, दी मुनि श्री समयसागर जी को निर्यापक श्रमण की उपाधि

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Vidyasagar.Guru

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आचार्य श्री के प्रवचनांश  

  • - परम्परा को निर्मल व अक्षुण्ण बनाये रखने हेतु प्रवचन सार में आचार्य कुंद कुंद देव ने निर्यापक शब्द की स्पष्ट व्याख्या की है|  
  • -  जब संघ में अनुभवी साधुओं का समूह तैयार हो जाता है तब संघ में नवदीक्षित मुनिराजों के निर्वाह के लिए निर्यापक श्रमण की व्यवस्था होती है जिससे संघ में श्रमणों का निर्वाह होता है और सम्पूर्ण संघ को इसका लाभ प्राप्त होता है| 
  • - मूलाचार में संघ में दीक्षित अर्यिकाओं के निर्वाह के लिए (शिक्षा, दीक्षा, प्रायश्चित इत्यादि) जो उनका गणधर होगा उसके व्यक्तित्व योग्यता गुण की अलग व्याख्या की गई है| 
  • -आवश्यकता अनुसार निर्यापकों की संख्या बढ़ाई भी जा सकती है|

 

 

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पूज्य श्री ने सही निर्णय लिया, परम पूज्य मुनि श्री समय सागर जी महाराज लंबी अवधि से इस दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं 

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