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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

खेती ही स्वर्ग सम्पत्ति है


संयम स्वर्ण महोत्सव

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खेती को देना बढ़वारी भू पर स्वर्ग बसाना है।

खेती का विरोध करना, राक्षसता का फैलाना है॥

खेती की उन्नति निमित पशुपालन भी आवश्यक है।
जो कि हमें दे दूध घास खावे फिर हल की साथ रहे॥४१॥

 

अहो दूध का नम्बर माना गया अन्न से भी पहला।

हर मानव क्या नहीं दूध माँ के से शिशुपन में बहला॥

दूध शाक ही खाद्य मनुज का पशु का भी दिखलाता है।

लाचारी में वा कुसङ्ग में, पलभक्षी हो जाता है ॥४२॥

 

अतः दूध की नदी बहे तृण कण की टाल लगे भारी।

फिर से इस भारत पर ऐसी, खेती की हो बढ़वारी॥

उत्पादन रक्षण रूपान्तर, करण यथा विधि खेती के।

हमें बताये बड़े जनों ने तीन तरीके हैं नीके ॥४३॥

 

पहला वैश्य जनों का दूजा, क्षत्रिय लोगों का धंधा।

तीजा शूद्रवर्ग का जिसमें, लगता कन्धे से कन्धा॥

एक दूसरे से हिलमिल यों, चलने से ही कार्य बने।

जो इसमें विरुद्ध हो जावे, वह जनता के प्राण हने ॥४४॥

 

कोई कहता हो कि कृषकता, तो हिंसा का साधन है।

इसीलिए है पाप अहो व्यापार किये होता धन है॥

किन्तु यहाँ पहले तो खेती बिना कहो व्यापार कहाँ।

ब्याज बनेगा तभी कि जब कुछ,भी होवेगा मूल जहाँ ॥४५॥

 

यद्यपि है व्यापार कारुपन खनिज चीज पर भी होता।

किन्तु न जीवन दाता केवल चकाचौंध का समझौता॥

अतः हमारे पूर्व जनों ने उसे दृष्टि में गौण किया।

कृषि संश्रित व्यापार कारुपन को ही यहाँ महत्त्व दिया ॥४६॥

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