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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

नीरोगता के साधन


संयम स्वर्ण महोत्सव

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मनोनियन्त्रण सात्त्विक भोजन यथाविधि व्यायाम करे।

वह प्रकृति देवी के मुख से सहजतया आरोग्य वरे॥

इस अनुभूत योग को सम्प्रति मुग्ध बुद्धि क्यों याद करे।

इधर उधर की औषधियों में तनु धन वृष बर्बाद करे॥५७॥

 

मन के विकार मदमात्सर्य क्रोध व्यभिचारादिक हैं।

नहीं विकलता दूर हटेगी, जब तक ये उद्रित्त्क रहें।

देखों काम ज्वर को वैद्यक में कैसा बतलाया है।

जिसमें फँसकर कितनों ही ने, जीवन वृथा गमाया है॥५८॥

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