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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज

बालकों को अशिक्षित रखने का फल


संयम स्वर्ण महोत्सव

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जहाँ बड़ों का विनय न कुछ भी और न अपनी लघुताई।

कोट बूट पतलून हैट हो और गले में हो टाई॥ १२१॥

 

खटिया से उठते ही टी हो, फिर मुँह में आवे सिगरेट।

भगवन्नाम चीज क्या होता गुडमोर्निग जहाँ हो भेट॥

रोटी खाई फुरसत पाई ताम गज्जफा करने को।

एक दूसरे के अवगुण कह आपस में लड़ मरने को॥१२२॥

 

कहा गया यदि कहीं कि बेटे कुछ धन्धा भी देखों ना?

नहीं समूचा समय चाहिये खेलकूद में ही खोना॥

तो जवाब मिलता है चट से अब तो तुम जीवित हो ना?

मर जावोगे तो देखेंगे पहले ही से क्यों रोना॥१२३॥

 

अपढ़ों की यह बात पठित लोगों की जैसी परम्परा।

सो भी लिखा जा रहा उस पर ध्यान दीजिये आप जरा॥

अगर किसी भी विद्यालय में भाग्योदय से दाखिल हो।

अक्षर रटे पास हो आये तेतीस नम्बर लिए अहो॥१२४॥

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