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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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विद्याधर जी का प्रिय भजन - 83 वां स्वर्णिम संस्मरण

"अप्रैल 1968 नसीराबाद में हम लोग ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्ति के लिए रात में जाते थे।" तब समाज के कुछ लोग भजन सुनाते थे, विद्याधर जी को एक भजन बहुत अच्छा लगा वह मेरे पिताजी नेमीचंद जी गदिया से प्रतिदिन वहीं भजन सुनाने के लिए कहते थे, और स्वयं भी साथ साथ मधुर वाणी में बोलते थे। उनकी मधुर वाणी में भजन सुनकर हम युवा बड़े प्रभावित हुए, वह भजन हम लोगों ने तैयार कर लिया फिर मुनि दीक्षा के बाद सन 1972 में आए और जून 1973 तक रहे तब कई बार वह भजन हम लोगों ने उन्हें सुनाया वह इस प्रकार है- लय- रिम

गुणानुरागी विद्याधर - 82 वां स्वर्णिम संस्मरण

एक बार की बात है सदलगा के पास में निप्पाणी शहर है, वहां चलने के लिए विद्याधर ने मुझसे(महावीर प्रसाद जी) कहा- तब मैंने पूछा क्यों जाना ? तो बोला- "वहां पर आचार्य विनोबा भावे जी भाषण देने के लिए आ रहे हैं मुझको उनके भाषण सुनना है वह देश के लिए और देश के गरीबों के लिए बहुत अच्छा काम करते हैं अच्छा भाषण देते हैं इसलिए हमको उनका भाषण सुनना चाहिए। "तब हम दोनों पिताजी के पास गए और बोले हम लोगों को विनोबा भावे जी का भाषण सुनना है। तब पिताजी ने समझाते हुए ऊंचे स्वर में कहा- वह भूदान के लिए भाषण देने आ रह

गुरु दर्शन महिमा - 81 वां स्वर्णिम संस्मरण

जब गुरु ज्ञान सागर जी महाराज हमारे यहाँ दादिया ग्राम में प्रवास कर रहे थे, तब ज्ञान सागर जी महाराज आहार की पश्चात धूप में थोड़ी देर बैठते थे। उस वक्त समाज के लोग ब्रह्मचारी विद्याधर जी के भजन बोलने के लिए कहते थे। किंतु विद्याधर जी मौन बैठे रहते थे। फिर गुरुवर ज्ञान सागर जी महाराज की स्वीकृति पाकर भजन बोलते थे। बड़ी ही मीठी आवाज में भजन गाते थे। रोज नया भजन सुनाते थे, इस कारण बालक-युवा-महिलाऐं सब लोग गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की आहार के पश्चात मन्दिर जी में एकत्रित हो जाते थे और भजन सुनते थे। ए

महाकारुणिक संत - 80 वां स्वर्णिम संस्मरण

आचार्य श्री जी के जीवन में बचपन से ही जीवों के प्रति करुणा भाव कूट - कूट भरा हुआ है।उनके जीवन की प्रत्येक क्रिया करुणा से ओत-प्रोत है, हर क्रिया में करुणा झलकती है। वे करूणा के भंडार है, करुणा की मूर्ति है। आचार्य भगवन के अंदर करुणा और दया को देखकर मन उनके प्रति श्रद्धा से भरकर प्रफुल्लित हो जाता है। 17 नवंबर 1972 (नैनागिर) की बात है- बारह वर्ष से धर्मशाला के निकट एक कुत्ता रहता था।उसने खाद्य पदार्थ समझकर के एक दिन अग्निगोलक अस्त्र (बम) खा लिया। उसका विस्फोट हो जाने से उसका मुख क्षत-विक्षत हो गय

सात्विक व्यंग्य - 79 वां स्वर्णिम संस्मरण

ब्यावर के पश्च्यात १९७४ में आचार्य श्री ने अजमेर में चातुर्मास किया। आचार्य श्री दिव्य पुरुष है, प्रत्येक चातुर्मास में ऐसी घटनाएँ घटित होती है , जो इतिहास का अंग बन जाती हैं  आचार्यश्री प्रातः कालीन प्रतिक्रमण कर बैठे थे। भक्तो से चर्चा कर रहे थे। महाराष्ट्र अकलुज से एक युवा डॉक्टर चुन्नीलाल एम. बी. बी. एस. भी आचार्य श्री के दर्शन को आए थे। आचार्य श्री की आध्यत्मिक साधना और ज्ञान से प्रभावित होकर आध्यत्मिक-चर्चा करते रहते थे। एक दिन चर्चा के पश्चात आचार्य श्री की चरण रज लेने के लिए झुके तो उनकी

संतत्व से सिद्धत्व की अविराम यात्रा का पथिकन - 78 वां स्वर्णिम संस्मरण

30 जुलाई 1968, श्री भागचंद सोनी जी की नशियाँ बात उस समय की है जब युवा ब्रह्मचारी विद्याधर की मुनि दीक्षा होनी थी। सबसे पहले ब्रह्मचारी विद्याधर ने मुनि ज्ञान सागर जी की चरण वंदना की, उसके बाद मुनि श्री से दिगंबर दीक्षा प्रदान करने हेतु प्रार्थना की। मुनि श्री ने दीक्षा पूर्व जनसमूह के समक्ष अपनी भावनाएं प्रस्तुत करने हेतु विद्याधर को निर्देश दिया।मुनि श्री की अनुमति पाकर विद्याधर ने सिद्धम नम:, सिद्धम नम: के पवित्र उच्चारण के पश्चात आदि तीर्थंकर ऋषभदेव की प्रशस्ति में मंगलाचरण का उच्चारण किया,पश

आध्यत्म गीत - 77 वां स्वर्णिम संस्मरण

आचार्य संघ का विहार चूलगिरी से श्रवणबेलगोल के लिए निर्विघ्न चल रहा था। विद्याधर कहार बने डोली उठा रहे थे श्रवणबेलगोल के निकट यात्री दल पहुँचा। सर्पीली पहाड़ियां, दुर्गम चढ़ाई, देवदारुओं का सघन वन, दूर दूर तक कोई बस्ती नहीं। कहार हाँफने लगे हय्या हय्या करने लगे। युवा विद्याधर के कंठ से एक मधुर गीत झरने लगा  अर्हत् राम, रमैया   हैया हो रे, हैया      मेरे अर्हत् पावन हैं          करुणा के वे सावन है           जन्म मृत्यु के दोनों तट से               पार लगाते नैया अर्हत् राम, रमैया

विश्राम - 76 वां स्वर्णिम संस्मरण

उस समय सारा संघ नेमावर में साधनारत था । गर्मी का समय था, रात्रि में 12 बजे तक गरम हवा चलती थी। रात्रि में नींद नही ले पाते थे। कुछ महाराजो ने आचार्य महाराज से निवेदन किया कि- हम लोग नदी में जाकर रेत में रात्रि विश्राम करने के लिए चले जाया करेंगे। तब आचार्य महाराज ने कहा- ठीक है, जाओ नदी में रेत भी है और वहाँ श्मशान भी है दो चार महाराज हो जाओ ठीक रहेगा। कुछ सोचकर बोले - अगर रात्रि विश्राम के लिए वहाँ जा रहे हो तो मेरा आशीर्वाद नही है बल्कि साधना करने जा रहे हो तो मेरा आशीर्वाद है। आचार्य मह

स्वर्णिम युगपुरूष - 75 वां स्वर्णिम संस्मरण

महापुरुषों की जन्म तपस्या एवं निर्वाण स्थली रहे धर्म प्रधान भारत देश की पहचान आध्यात्मिकता है और अहिंसा, त्याग आदि इसकी विशिष्टता है। प्रत्येक युग में युगदृष्टाओ ने यहां जन्म लेकर तप साधना के आदर्श प्रस्तुत किए हैं। ऐसे महापुरुषों के व्यक्तित्व एवं सत्कार्य प्रकाश स्तंभ के समान युगों युगों तक जन जन के जीवन को प्रेरणा के स्रोत के रूप में प्रकाशित करते रहते हैं। उनकी अमर जीवन गाथाएं स्वर्णाक्षरों में लिखी जाने योग्य हैं। वर्तमान युग में ऐसे ही आदर्श महापुरुष हैं विश्वविख्यात महान तपस्वी महाकवि दिग

सुविधा नहीं संयम - 74 वां स्वर्णिम संस्मरण

गर्मी का समय था,उन दिनों में मेरी शारीरिक अस्वस्थता बनी रहती थी। मैं आचार्य महाराज के पास गया और मैंने अपनी समस्या निवेदित करते हुए कहा- आचार्य श्री जी! पेट में दर्द(जलन) हो रहा है। आचार्य महाराज ने कहा-गर्मी बहुत पड़ रही है, गर्मी के कारण ऐसा होता है और तुम्हारा कल अंतराय हो गया था,इसलिए पानी की कमी हो गई होगी सो पेट में जलन हो रही है। कुछ रुककर गंभीर स्वर में बोले कि-क्या करें यह शरीर हमेशा सुविधा ही चाहता है लेकिन इस मोक्षमार्ग में शरीर की और मन की मनमानी नहीं चल सकती। बाहरी दु:ख के प्रति अचेत

महावीर प्रभु समान जीवंत चर्या - 73 वां स्वर्णिम संस्मरण

गुरु जी का उपदेश चल रहा था, हम सभी साधक उस उपदेशामृत का पान कर रहे थे। आचार्य श्री ने बताया कि- समय अनुसार हमें कभी कठोर तो कभी मृदु चर्या के माध्यम से साधना विकास उन्मुखी बनाना चाहिए। लेकिन तेज सर्दी और तेज गर्मी में साधना करना बहुत मुश्किल है आज खुले में साधना करने वालों के दर्शन दुर्लभ है। तब मैंने कहा- आचार्य श्री जी मैंने सुना है पहले आप, जब राजस्थान में थे तब खुले में पहाड़, श्मशान आदि पर जाकर साधना करते थे यह सुनकर आचार्य श्री जी कुछ क्षण मौन रहे, फिर बोले - केकड़ी राजस्थान के पास बघेरा ग

गुरु की छांव - 72 वां स्वर्णिम संस्मरण 

बड़े महाराज की बातों में बड़ा यानि महान राज रहता है, बहुत बड़ा रहस्य छुपा होता है। उनकी वाणी से सूत्र वाक्य निकलते हैं। यदि उनका अर्थ लगाया जाए तो बहुत बड़ा उपदेश उस सूत्र वाक्य के माध्यम से प्राप्त हो जाता है जो बिखरे जीवन को एक नया आयाम दे सकता है। इस जीवन को सत्य की सुगंध से सुभाषित कर सकता है। संसार के वास्तविक स्वरूप का बोध प्रदान कर सकता है।   सर्दी का मौसम था, ठण्ड बहुत पड़ रही थी इस कारण से सभी लोग तेज धूप में ही बैठे हुए थे। लेकिन आचार्य महाराज वहीं छाँव में विराजमान थे। सभी लोगों

बेटियां एक कोहिनूर - 71 वां स्वर्णिम संस्मरण

आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के श्री मुख से बेटियों के बारे में कहा गया यह पौराणिक कथन हर पिता के भाग्य मे बेटी नहीं होती राजा दशरथ जब अपने चारों बेटों की बारात लेकर राजा जनक के द्वार पर पहुँचे तो राजा जनक ने सम्मानपूर्वक बारात का स्वागत किया। तभी दशरथ जी ने आगे बढकर जनक जी के चरण छू लिये। चाॅककर जनक जी ने दशरथ जी को थाम लिया और बोले महाराज आप मुझसे बड़े है और तो और वरपक्ष वाले है ये उल्टी गंगा कैसे बहा रहे हैं .....?   इस पर दशरथ जी ने बड़ी सुंदर बात कही, महाराज आप दाता हो कन

आत्मतत्व - 70 वां स्वर्णिम संस्मरण

आज का विज्ञान खोज की दिशा में बहुत आगे बढ़ गया हैं।लेकिन वह आज जड़ की ही खोज कर पाया है।उसने शरीर मे प्रत्येक नस-नस की खोज कर ली, कोई भी शरीर काअवयव उससे अछूता नहीं रह गया। लेकिन शरीर के अंदर आत्मा नाम की कोई वस्तु है या नहीं,इसके बारे में वह मौन है।उसे वह नहीं खोज पाया।मात्र जड़ पदार्थों को ही विषय बना पाया है,क्योंकि प्रत्येक जड़ पदार्थ में रूप,रस,गन्ध,वर्ण और स्पर्श पाया जाता है।लेकिन इन रूप, रस आदि से रहित उस आत्म तत्व को नहीं खोज पाया,क्योंकि वह इंद्रियों का विषय नहीं बनता।वह आत्म तत्व तो योगिग

अद्भुत चर्या - 69 वां स्वर्णिम संस्मरण

जो जैसा स्वयं जीवन में जीते है,वही औरों को भी उपदेश देते हैं। उनकी कथनी हमेशा करनी से भरी होती है,जो कि हम सभी को अंदर से प्रभावित करती है उनके प्रति श्रद्धान को मजबूत बनाती है। गर्मी का समय था कुंडलपुर में ग्रीष्मकालीन वाचना प्रारंभ हो चुकी थीं। वहाँ पर विशेष रूप से चारों ओर कुंडालकर पहाड़ी होने से गर्मी ज्यादा पड़ती है,वहीं ऊपर पहाड़ पर शौच क्रिया के उपरांत आचार्य महाराज और हम कुछ महाराज पेड़ के नीचे बैठे हुए थे। चर्चा चल रही थी,चर्चा के दौरान आचार्य महाराज ने शिक्षा देते हुए कहा-ऐसे ही जंगलों में

करुणा के सागर - 68 वां स्वर्णिम संस्मरण

कार्तिकेयानुप्रेक्षा ग्रन्थ में आचार्य कार्तिकेय स्वामी महाराज कह रहे है कि- "जीवाणं रक्खणम धम्मो"  अर्थात जीवों की रक्षा करना धर्म है और धर्म की मूल जड़ गया है। यह सारी बातें ग्रंथों से पढ़ते समय तो बहुत अच्छी लगती है लेकिन वो जीवन में उतारना बड़ा कठिन होता है। आचार्य भगवन श्री विद्यासागर जी महाराज के अंदर हमने यह करुणा और दया देखी है जिसको देख कर मन उनके प्रति श्रद्धा से भरकर प्रफुल्लित हो जाता है। सन 2000 मई जून के महीने का यह प्रसंग जब राजस्थान प्रांत में पानी की बहुत कमी होने से वहां

स्वाध्याय - 67 वां स्वर्णिम संस्मरण

श्री धवलाजी ग्रंथ की वाचना चल रही थी। आचार्य महाराज श्री ने कहा- पंडित जगन्मोहन लाल जी कटनी वालों ने एक दिन मुझे बताया कि- एक कोई व्रद्ध महान ग्रंथ को पढ़ रहे थे तो मैंने पूँछ- समज में आ रहा है, जो भी आप पढ़ रहे है। वृद्ध ने कहा ,हाँ इतना समज में आ रहा है कि-हम पढ़ रहे है, हमे तो स्वाध्याय करना है बस। गुरुदेव ने आगे बताया कि- बात सच है, जो केवलज्ञान के द्वारा जाना गया है वह हम पूर्ण नही जान सकते इसलिए यह प्रभु की वाणी है। ऐसा श्रद्धान रखकर पढ़ते जाना चाहिए क्योंकि ये तो मंत्र जैसे है। आचार्यो के प्र

वे नहीं रहे - 66 वां स्वर्णिम संस्मरण

शीतकाल में भोजपुर क्षेत्र पर सारा संघ विराजमान था। प्रकृति के बीचों- बीच श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ भगवान का मंदिर है। मंदिर प्रांगण से ही लगा हुआ जंगल है, बहुत विशाल-विशाल चट्टानें है।  चारो ओर हरियाली ही हरियाली नजर आती है। वहाँ बैठते ही ध्यान लग जाता है, ध्यान लगाने की जरूरत नही पड़ती ।  वहीं जिनालय से कुछ दूरी पर एक दो  मंजिल का।महल है, जो खण्डहर हो चुका है। उसमे आज भी सुंदर कलाकृति बानी हुई है। एक दिन आचार्य महाराज उस कलाकृति को देख रहे थे, उन्होंने कहा- इतना विशाल महल, इतनी अच्छी कलाक

हितोपदेश - 65 वां स्वर्णिम संस्मरण

संसारी प्राणी सुख चाहता है, दु:ख से भयभीत होता है। दु:ख छूट जावे ऐसा भाव रखता है। लेकिन दुःख किस कारण से होता है इसका ज्ञान नही रखा जावेगा तो कभीभी दुःख से दूर नही हुआ जा सकता। आचार्य कहते हैं - कारण के बिना कोई कार्य नही होता इसलिए दुःख के कारण को छोड़ दो दुःख अपने आप  समाप्त हो जायेगा। सुख के कारणों को अपना लिया जावे तो सुख स्वतः ही उपलब्ध हो जावेगा। दुःख की यदि कोई जड़(कारण) है तो वह है परिग्रह। परिग्रह संज्ञा के वशीभूत होकर यह संसारी प्राणी संसार मे रूल रहा है, दुःखी हो रहा है। पर वस्तु को अपन

अमूल्य का क्या मूल्य - 64 वां स्वर्णिम संस्मरण

अमूल्य का अर्थ स्पष्ट है, जिसका कोई मूल्य नही आंका जा सकता उसे अमूल्य कहते है। अमूल्य वस्तु को पाना बहुत दुर्लभ होता है उसका समीचीन उपयोग कर पाना और ही दुर्लभ हुआ करता है। संसार मे प्रत्येक वस्तु का मूल्य हो सकता है लेकिन जिनके माध्यम से संसार सागर से पार उतरने की कला सीखी जाती हो वह तो अमूल्य ही होता है। देव-शास्त्र गुरु हमारे आराध्य हैं और पूज्यनीय हैं। इसलिए वे  हमारे लिए हमेशा अमूल्य हैं। जहाँ पर श्रद्धा जुड़ जाती है ,अपनत्व होता है, वहाँ कीमत वस्तु नही रह जाती है, वह अमूल्य हो जाता है। उनके

कब अस्त हो - 63 वां स्वर्णिम संस्मरण

हम सब संसार मे रहकर रोज, प्रतिदिन संसार की वस्तुओं को देखते है लेकिन हमारी दृष्टि उस ओर नाही जा पाती। ये वस्तुयें हमे संसार की नश्वरता का बोध कराती है। यदि हम चाहे तो प्रत्येक वस्तु से या घटना से कुछ सिख सकते है, वैराग्य प्राप्त कर सकते है, लेकिन हमारी दृष्टि उस वस्तु के स्वरूप की ओर जाना चाहिए तभी संभव है।    सर्वोदय तीर्थक्षेत्र अमरकण्टक 12.10.2003 रविवार की बात है में शाम को छत पर खड़ा था। सूर्य अस्त होता होता जा रहा था उसी ओर ध्यान लगाये था की इतने में आचार्य महाराज भी छत पर पधार गय

सुविधा नही संयम - 62 वां स्वर्णिम संस्मरण

गर्मी का समय था, उन दिनों में मेरी शारीरिक अस्वस्थता बानी रहती थी। मैं आचार्य महाराज के पास गया और अपनी समस्या निवेदित करते हुए कहा - आचार्य श्री जी! पेट मे दर्द(जलन)हो रहा है। आचार्य महाराज ने कहा - गर्मी बहुत पड़ रही है, गर्मी के कारण ऐसा होता है और तुम्हारा कल अंतराय हो गया था इसीलिए पानी की कमी हो गई होगी सो पेट मे जलन हो रही है कुछ रुककर गंभीर स्वर में बोले की - क्या करे यह शरीर हमेशा सुविधा ही चाहता है लेकिन इस मोक्षमार्ग में शरीर और मन की मनमानी नही चल सकती। "वहिर्दुः खेषु अचेतनः"  अर्थात्

अन्तर्जगत - 61 वां स्वर्णिम संस्मरण

किसी सज्जन ने आचार्य भगवन् से कहा - आज पुनः देश भोग से योग के ओर लौट रहा है। आज जगह जगह योग शिबीर आयोजित किये जा रहे है। योगासन के माध्यम से लोगो को रोग मुक्त किया जा रहा है। बड़ी से बड़े बीमारियों से लोगो को योगासन से लाभ मिल रहा । आज योग शिक्षा के क्षेत्र में देश बहुत ध्यान दे रहा है। आज योग का क्षेत्र अंतराष्ट्रीय हो गया है। यह सब आचार्य महाराज चुपचाप सुनते रहे फिर मुस्कुरा कर बोले क "योग का क्षेत्र अंतरराष्ट्रीय नही अन्तर्जगत है" योग लगाने का अर्थ है मन-वचन-काय की प्रवृति को बाह्य जगत से हटा

प्रथम-दर्शन - 60 वां स्वर्णिम संस्मरण

मैं (क्षमासागर जी) उस दिन पहली बार आचार्य महाराज के दर्शन करने कुण्डलपुर गया था।आचार्य महाराज छोटे से कमरे में बैठे थे। इतना बड़ा व्यक्तित्व इतने छोटे स्थान में समा गया, इस बात ने मुझे चकित ही किया। उनके ठीक पीछे खुली हुई एक बड़ी सी खिड़की और उससे झाँकता आकाश, उस दिन पहली बार बहुत अच्छा लगा। खिड़की से आती रोशनी में दमकती आचार्य- महाराज की निरावरित देह से निरन्तर झरते वीतराग-सौन्दर्य ने मेरा मन मोह लिया।   क्षण भर के लिए मैं वीतरागता के आकर्षण में खो गया और कमरे के बाहर ही ठिठका खड़ा रह गया।

निर्मलता - 59 वां स्वर्णिम संस्मरण

सागर की वर्णी भवन, मोराजी में आचार्य महाराज के सानिध्य में ग्रीष्मकालीन वासना चल रही थी। गर्मी पूरे जोरों पर थी। 9:00 बजे तक इतनी कड़ी धूप हो जाती थी कि सड़क पर निकलना और नंगे पैर चलना मुश्किल हो जाता था। आहार-चर्या का यही समय था आचार्य महाराज आहार-चर्या के लिए प्रायः मोराजी भवन से बाहर निकलकर शहर में चले जाते थे। मोराजी भवन में ठहरना बहुत कम हो पाता था। पंडित पन्नालाल जी साहित्याचार्य का निवास मोराजी भवन में ही था।और वें पड़गाहन के लिए रोज खड़े होते थे। उनके यहां आने का अवसर कभी-कभी आ पाता था। 
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