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मेरे गुरुवर... आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज
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तपस्या और तपस्या का फल - 105 वां स्वर्णिम संस्मरण

मुझे आज भी वो दृश्य याद है जब 1983 में आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज कलकत्ता आये थे और कलकत्ता प्रवेश से पूर्व बाली मंदिर में ठहरे थे । मैं सुबह 4 बजे गुरुदेव का दर्शन करने तथा उनके साथ विहार करने के उद्येश्य से गया था । आचार्य श्री नवम्बर महीने की सर्दी में खुले में बैठकर सामायिक / ध्यान कर रहे थे । सारा शरीर मच्छरों से ढका था । मैं टकटकी लगाकर उन्हें देखता रहा । आँखों पर, कानों में, नाक में, हाथों पर, हाथों की अंगुलियों पर, पूरे पैरों पर मोटे मोटे मच्छर जमा हो रखे थे । आचार्य श्री दो घंटे से

वीतरागी संत के आगे सभी साधक गण नतमस्तक होते

*नेमावर से गौरझामर के बिहार के समय, बापौली धाम, फरवरी 2015* VID-20190327-WA0060.mp4   *आहार चर्या के लिए यह स्थान निश्चित किया गया था, महंत जी के विशेष आग्रह पर संघ सहित गुरु जी ने उस आश्रम के अंतरंग परिसर में प्रवेश किया एवं आहार हेतु उठने के पहले की जाने वाली भक्तियॉ वहीं पर बैठ कर सभी मुनि महाराजों ने की, इसी दौरान महंत जी सहित सभी शिष्यों ने आचार्य महाराज का पाद प्रक्षालन एवं पुष्पमाला आदि से भक्ति पूजन संपन्न किया।* *लाल वस्त्रों में जो स्वामी जी हैं उनका 12 वर्ष से मौन

Vidyasagar.Guru

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आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज* द्वारा बहुत ही करुणा भाव से गौवंश को णमोकार मंत्र* सुनाया

_*💦🥀नेमावर अपडेट🥀💦*_ _*✨गुरुवार,1 अगस्त 2019✨*_ _*गौवंश को किसी ट्रक वाले ने टक्कर लगा कर घायल  कर दिया।* अहो सौभाग्य उस गौवंश का जो सिद्धोदय नेमावर जी के मंदिर जी के बाहर ही *आचार्य श्री विद्यासागर जी मुनिराज* द्वारा बहुत ही करुणा भाव से उसे *णमोकार मंत्र* सुनाया  गया...हम सब ये दृश्य देखकर उपस्थित सभीजन *भाव विभोर* हो गये।_   VID-20190801-WA0065.mp4

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नमस्कार में चमत्कार - संस्मरण क्रमांक 35

☀☀ संस्मरण क्रमांक 35☀☀            ? नमस्कार में चमत्कार ? पथरिया नगर की बड़े मंदिर में नई वेदी पर पारसनाथ भगवान को विराजमान किया जा रहा था, पाषाण की प्रतिमा वजन में भारी थी,व्यवस्थित वेदी पर रखी नहीं जा रही थी, हम सभी साधक गुरुदेव के साथ वही उपस्थित थे। बहुत प्रयास के बाद जब प्रतिमा जी नहीं विराजमान हो पाई तो आचार्य महाराज से कहा आप प्रतिमा जी में हाथ लगा दीजिए ताकि प्रतिमा जी विराजमान हो जाए, आचार्य भगवान ने जैसे ही प्रतिमा जी में हाथ लगाया प्रतिमा जी व्यवस्थित वेदी में विराजमान हो गई यह

स्वर्णिमसंस्मरण ग्रुप का इतिहास

अब तक का सफर (1) प्रस्तावना एक शिष्य दिन-रात, प्रतिपल यही मन में भावना भाता है कि- जिन सद्गुरु ने एक नया जीवन दिया, जो हर 1 श्वास में बसे हुए है, जो हृदय की धड़कन की तरह सदा इस दिल में धड़कते रहते है। जिन सद्गुरु ने रास्ते मे पड़े हुए इस कंकड़, पत्थर को उठाकर अपनी छत्रछ्या में रखकर इसे अच्छे संस्कारो से पल्लवित कर इसमें छुपी हुई अनन्त संभावनाओं को उजागर कर उसे एक हीरे का रूप दिया। इस कंकड़ पर अनन्त उपकार किये, जो वह अपने जीवन की अंतिम श्वासों तक स्मरण करेगा। कभी नहीं भूल पाएंगे, उन उपकारों को। इ

प्रत्युत्पन्नमति मुनि श्री विद्यासागर जी - 104 वां स्वर्णिम संस्मरण

ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, के ज्ञाता गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के रत्नत्रयी गुणों के सागर में अवगाहन कर वंदन करता हूँ....  हे गुरुवर! आपने मुनि विद्यासागर जी की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें हिन्दी, संस्कृत भाषा में तो निपुण बनाया ही साथ ब्रम्हचारी अवस्था में विद्याधर जी को अंग्रेजी भाषा की रुचि होने के कारण आपने उन्हें अंग्रेजी भाषा का ज्ञान कराने के लिए भी विद्वान लगवाए थे। एक वर्ष की अवधि में ही विद्याधर जी अंग्रेजी में पारंगत हो गए थे। इस विषय में दीपचंद जी छाबड़ा नांदसी वालो ने एक संस्म

गुरुदेव ने मुनि विद्यासागर जी को उदाहरण के स्वरूप प्रस्तुत किया - 103 वां स्वर्णिम संस्मरण

जीवन में स्वयंभू, सत्यधर्मो का प्रकाश प्रकट करने वाले गुरूवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के प्रकाशवान् चरणो में वंदना करता हूँ.... हे गुरुवर! मेरे गुरु की साधना और वैराग्य को देखते हुए आप इतने प्रभावित हुए थे, कि आपने, उनको उदाहरण के रूप में उपस्थित किया था। वह वाकया पण्डित विद्याकुमार सेठी जी ने १९९४ अजमेर चातुर्मास में मुझे सुनाया। जिसे सुनकर हम शिष्यों को गौरव की अनुभूति होती है। वह संस्मरण हमने लिख लिया था, जो आपको प्रेषित कर रहा हूँ........   गुरुदेव ने मुनि विद्यासागर जी को उदाहरण क

हाजिरजवाबी ब्रम्हचारी विद्याधर - 102 वां हीरक संस्मरण

ज्ञानरथ के सार्थवाह गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को कोटिशः प्रणाम करता हूँ.... हे गुरुवर! आपके लाडले शिष्य ब्रम्हचारी विद्याधर जी आपको तो जवाब नही देते थे किन्तु अज्ञानियों के अज्ञान अंधकार को दूर करने के लिए कम शब्दों में, टू द पॉइंट बोलकर संतुष्ट करके निरुत्तर कर देते थे। इस सम्बन्ध में नसीराबाद के आपके। अनन्य भक्त रतनलाल पाटनी जी ने विद्याधर के हाजिर जवाबी का संस्मरण सुनाया-    हाजिरजवाबी ब्रम्हचारी विद्याधर "१९६८ ग्रीष्मकालीन प्रवास के दौरान नसीराबाद में ज्ञानसागर मुनिराज न

ब्र विद्याधर जी ने पाप-पुण्य की समझाइस दी - 101 वां हीरक संस्मरण

भवभव के नीरंध्र अज्ञान को ज्ञानप्रभा से भेदने वाले गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों में त्रिकाल प्रणति अर्पित करता हूँ..... हे गुरुवर! अब में नसीराबाद के कुछ संस्मरण आपको प्रेषित कर रहा हूँ। ब्र विद्याधर जी आपके साथ-साथ जहाँ भी जा रहे थे वहाँ के लोग उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होते और उनकी मधुर बातों से शिक्षा लेते। विद्याधर की साधना ऐसी साधना थी जिसको देखकर हर कोई अचम्भित हुए बिना नही रहता था। आज जब नसीराबाद के किसी भी समाज जन से उस समय की बात करते है तो वो ब्र विद्याधर के अनेकों संस्मर

गुरु दर्शन महिमा - 81 वां स्वर्णिम संस्मरण

जब गुरु ज्ञान सागर जी महाराज हमारे यहाँ दादिया ग्राम में प्रवास कर रहे थे, तब ज्ञान सागर जी महाराज आहार की पश्चात धूप में थोड़ी देर बैठते थे। उस वक्त समाज के लोग ब्रह्मचारी विद्याधर जी के भजन बोलने के लिए कहते थे। किंतु विद्याधर जी मौन बैठे रहते थे। फिर गुरुवर ज्ञान सागर जी महाराज की स्वीकृति पाकर भजन बोलते थे। बड़ी ही मीठी आवाज में भजन गाते थे। रोज नया भजन सुनाते थे, इस कारण बालक-युवा-महिलाऐं सब लोग गुरुवर ज्ञानसागर जी महाराज की आहार के पश्चात मन्दिर जी में एकत्रित हो जाते थे और भजन सुनते थे। ए

सिर की चोटी बांधकर अध्ययन करते विद्याधर - 97 वां स्वर्णिम संस्मरण

मदनगंज किशनगढ़ चातुर्मास में ब्रह्मचारी विद्याधर जी, पंडित श्री महेंद्र कुमार जी पाटनी शास्त्री जी से संस्कृत एवं हिंदी भाषा का ज्ञानार्जन करते थे। पंडित जी से उन्होंने कातंत्र रूपमाला (संस्कृत व्याकरण) धनंजय नाममाला (शब्द कोश) एवं श्रुतबोध (छंद रचना) इन 3 संस्कृत ग्रंथों को पढ़ा था। जितना वो पढ़ते थे उतना वह याद कर लेते थे और पंडित जी को सुनाते थे।   इसी प्रकार मदनगंज किशनगढ़ के शांतिलाल गोधा जी (आवड़ा वाले) ने लिखा- 1967 मदनगंज-किशनगढ़ के दिगंबर जैन चंद्रप्रभु मंदिर में ज्ञान सागर जी म

आत्मतत्व - 70 वां स्वर्णिम संस्मरण

आज का विज्ञान खोज की दिशा में बहुत आगे बढ़ गया हैं।लेकिन वह आज जड़ की ही खोज कर पाया है।उसने शरीर मे प्रत्येक नस-नस की खोज कर ली, कोई भी शरीर काअवयव उससे अछूता नहीं रह गया। लेकिन शरीर के अंदर आत्मा नाम की कोई वस्तु है या नहीं,इसके बारे में वह मौन है।उसे वह नहीं खोज पाया।मात्र जड़ पदार्थों को ही विषय बना पाया है,क्योंकि प्रत्येक जड़ पदार्थ में रूप,रस,गन्ध,वर्ण और स्पर्श पाया जाता है।लेकिन इन रूप, रस आदि से रहित उस आत्म तत्व को नहीं खोज पाया,क्योंकि वह इंद्रियों का विषय नहीं बनता।वह आत्म तत्व तो योगिग

परीषय-विजय - संस्मरण क्रमांक 53

??????????    ☀☀ संस्मरण क्रमांक 53☀☀    ? परीषय-विजय ?  आचार्य महाराज का उन दिनों बुन्देलखंड में प्रवेश हुआ था।उनकी निर्दोष मुनि-चर्या और अध्यात्म का सुलझा हुआ ज्ञान देखकर सभी प्रभावित हुए।कटनी में आए कुछ ही दिन हुए थे कि महाराज को तीव्र ज्वर हो गया। प.जगन्मोहनलाल जी की देखरेख में उपचार होने लगा।सतना से आकर नीरज जी भी सेवा में संलग्न थे।एक दिन मच्छरों की बहुलता देखकर पंडित जी ने रात्रि के समय महाराज के चारों ओर पूरे कमरे में मच्छरदानी लगवा दी। सुबह जब महाराज ने मौन खोला तो कहा कि- य

परीषयजयी साहसी विद्याधर - 84 वां स्वर्णिम संस्मरण

सदेह में विदेह भोक्ता गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज को मेरा कोटि कोटि वंदन...... हे गुरुवर!आज मैं आपको वह घटना याद करा रहा हूं जिससे आप कुछ विचलित सेे हुए थे किंतु विद्याधर जी के जवाब से आपके हर्षाश्रु आ गए थे, जिसे आप सहजता से छुपा दिए थे और रात भर आशीर्वाद देते रहे होंगे तो लाडले ब्रह्मचारी सुबह हंसते हुए मिले थे, जिसको किशनगढ़ के वो लोग आज तक नहीं भूले। जो उसके साक्षी थे। इस संबंध में शांतिलाल गोधा जी(आवड़ा वाले) मदनगंज किशनगढ़ से लिखते हैं- "सन 1967 मदनगंज किशनगढ़ चातुर्मास के दौरान

परीक्षा - संस्मरण क्रमांक 20

☀☀ संस्मरण क्रमांक 20☀☀            ? परीक्षा ?   चातुर्मास स्थापना का समय था, क्षुल्लक सुमति सागर जी की मुनि बनने की बड़ी भावना थी,साधना भी थी पर वृद्ध हो गए थे, आचार्य महाराज ने उनकी भावना के अनुरुप उन्हें मुनि दीक्षा दे दी। और वह मुनि वैराग्य सागर हो गए। दो-तीन माह तक उन्होंने महाव्रतों का बड़ी सावधानी से पालन किया, जीवन का अंत निकट जानकर और वृद्धावस्था का विचार करके आचार्य महाराज से सल्लेखना ग्रहण कर ली। मुनि की आहार चर्या सर्वोत्कृष्ट है, स्वस्थ व  अस्वस्थ हर दशा में समताभाव रखकर निर्

प्रथम परिक्षा के परीक्षक हुए हक्के-बक्के - 95 वां स्वर्णिम संस्मरण

आत्मपरीक्षक, आत्मोत्तरदाता, आत्मसमालोचक, गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज की आत्मदृष्टि को कोटिशः प्रणाम करता हूं...हे गुरुवर! आपश्री ने दादिया ग्राम में ब्रम्हचारी विद्याधर जी की साधना की चार बार परीक्षा ली थी ओर ब्रम्हचारी जी उन परीक्षा में शतःप्रतिशत पास ही नही हुए बल्कि त्यागी विद्यार्थी के रूप में सब के आदर्श बन गए थे। इस बारे में दादिया के पारस झाँझरी सुपुत्र हरकचंद जी झाँझरी ने बताया। प्रथम परीक्षा में परीक्षक हुए हक्के- बक्के "दादिया प्रवास में ब्रम्हचारी विद्याधर जी बडी ही साधना

शिथिलाचार विनाशक - संस्मरण क्रमांक 44

☀☀ संस्मरण क्रमांक 44☀☀            ? शिथिलाचार विनाशक ?  मुनिराज छहकाय के जीवों की हिंसा से विरक्त होते हैं,आधुनिक युग में विद्युत प्रयोग से उत्पन्न  अनेक साधन उपलब्ध होते हैं। आचार्य भगवन रात्रि में पठन, लेखन  आदि क्रिया ना स्वयं करते ना संघस्थो को करने के लिए अनुमोदित करते हैं। नैनागिरी शीतकाल में एक बार संघस्थ नव दीक्षित शिष्य ने आचार्य भगवंत से निवेदन करते हैं कि- रात्रि प्रतिक्रमण हम लोग रात में पढ़ नहीं सकते हैं इसलिए आपकी आज्ञा चाहते हैं कि बाहर प्रकाश उत्पन्न करने वाली लालटेन हैं,क

दृढ़ चरित्र - संस्मरण क्रमांक 22

☀☀ संस्मरण क्रमांक 22☀☀            ? दृढ़ चरित्र ?  आचार्य भगवन भविष्य में दृढ़ चारित्र का पालन करेंगे, चरित्र को अपने जीवन की अंतिम श्वासों तक बहुत अच्छे से अपनाएंगे, इसका पता पूज्य आचार्य श्री ज्ञानसागर जी को बहुत पहले चल चुका था बात उस समय कि है जब आचार्य भगवन ब्रम्हचारी अवस्था मे थे, जब ब्रह्मचारी विद्याधर जी मुनि श्री ज्ञानसागर जी महाराज के सानिध्य में केशलोंच कर रहे थे, उस समय प्रत्येक बाल खींचतें समय खून निकल रहा था, उस दृश्य को देखकर वहां पर उपस्थित क्षुल्लक श्री आदिसागर जी ने मुनिवर

दयासागर गुरुवर - 85 वां स्वर्णिम संस्मरण

ब्रह्मांड ज्ञान ऊर्जा धारक गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज आपके ज्ञानाचरण को नमन करता हूं...... हे गुरुवर! दया अहिंसा की मां है दया ही अहिंसा में परिणत होती है। विद्याधर सहज उत्पन्न दया के भंडार थे।यही कारण है कि विद्याधर की शुद्ध दया ही अहिंसा महाव्रत में परिणत हुई।   इस संबंध में मुनि योग सागर जी महाराज ने बताया- जेसे दूध में घी तैरता है वैसे ही भव्य पुरुष के हृदय में दया स्वाभाविक रूप से तैरती हुई नजर आती है। दया-अहिंसा,परोपकार को जन्म देती है योगियों की योग्यता का मापदंड दया है बच

दृढ़ संकल्प के धनी ब्र. विद्याधर - 100 वां हीरक संस्मरण

अविरल स्वभाव बोध में परिणमन कर असीमित रहस्य के समाधान प्राप्त गुरुवर श्री ज्ञानसागर जी महाराज के श्री चरणों में सम्पूर्ण विनय अर्पित करता हूं.... हे गुरुवर आपने ब्रह्मचारी विद्याधर को जितना दिया वो लेते गए, कुछ भी छोडना नहीं चाहते थे। इस कारण उन्होंने दृढ़ संकल्प कर रखा था कि रोज का होमवर्क रोज करके ही विश्राम करना एवं अपने संकल्प के पूरा करने में ऐसे दत्तचित्त रहते थे कि कोई भी बाधा उन्हें बाधा दे ही नहीं पाती थी। इस संबंध मे नसीराबाद के आपके भक्त कुंतीलाल जी गदिया ने ब्रह्मचारी विद्याधर जी के ब

विद्याधर जी का प्रिय भजन - 83 वां स्वर्णिम संस्मरण

"अप्रैल 1968 नसीराबाद में हम लोग ज्ञानसागर जी महाराज की वैयावृत्ति के लिए रात में जाते थे।" तब समाज के कुछ लोग भजन सुनाते थे, विद्याधर जी को एक भजन बहुत अच्छा लगा वह मेरे पिताजी नेमीचंद जी गदिया से प्रतिदिन वहीं भजन सुनाने के लिए कहते थे, और स्वयं भी साथ साथ मधुर वाणी में बोलते थे। उनकी मधुर वाणी में भजन सुनकर हम युवा बड़े प्रभावित हुए, वह भजन हम लोगों ने तैयार कर लिया फिर मुनि दीक्षा के बाद सन 1972 में आए और जून 1973 तक रहे तब कई बार वह भजन हम लोगों ने उन्हें सुनाया वह इस प्रकार है- लय- रिम

विद्याधर का ज्ञानविनय - 94 वां स्वर्णिम संस्मरण

आत्माभा में लीन गुरु ज्ञानसागर जी महाराज के चरणों मे सीमातीत वंदन... हे गुरुदेव! आपने ज्ञानपिपासु ब्रम्हचारी विद्याधर में जोज्ञान ज्योति प्रज्ज्वलित की। जिसे आज तक मेरे गुरुदेव आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज दिन-रात जलाये रखते है। किसी को उपसर्ग-परिषह-संकटो को झंझावातो में बूझने नही देते है। यह संस्कार बचपन से ही विद्याधर को प्राप्त हुए थे। इस सम्बन्ध में विद्याधर की गृहस्थावस्था की बहने ब्रह्महचारिणी सुश्री शान्ता, सुश्री सुवर्णा जी जब अशोकनगर(म.प्र.) प्रवास में थी, तब संस्मरण लिखकर भेजा था।

पाक कलाकार विद्याधर - 93 वां स्वर्णिम संस्मरण

अंधियारे भवारण्य के ज्ञानप्रकाश गुरुवार श्री ज्ञान सागर जी महाराज को त्रिकाल वंदन करता हूँ.... हे गुरुवर!आज में आपको आपके शिष्य, पाक कलाकार विद्याधर के बारे में बताता हूँ। इस सम्बन्ध में विद्याधर की बहने ब्रम्हचारिणी सुश्री शान्ता जी, सुश्री सुवर्णा जी ने प्रश्न का जवाब लिखकर भिजवाया पाक कलाकार विद्याधर "भोजन करना अलग बात है, भोजन बनाना अलग। जिसे पाक कला के नाम से जाना जाता है। पाक कला से संस्कृति का परिचय सहज हो जाता है। इस कला में महिलाएं निपुण होती है, किन्तु पुरषों का निपुण होना कला सज्ञा को

विनम्र श्रद्धा - संस्मरण क्रमांक 15

☀☀ संस्मरण क्रमांक 15☀☀            ? विनम्र श्रद्धा ?   एक बार की बात है सिवनी के बड़े मंदिर में पूज्य आचार्य भगवान विराजमान थे,वयोवृध्द पंडित सुमेर चंद जी दिवाकर उनके दर्शन करने आए,तत्व चर्चा चलती रही, जाते समय पंडित जी बोले कि-  महाराज हमें तो आचार्य शांति सागर जी महाराज ने एक बार मंत्र जपने के लिए माला दी थी, जो अभी तक हमारे पास है।  पंडित जी का आशय था कि-आप भी हमें कुछ दें,पर आचार्य भगवन तत्काल बोले कि - पंडित जी हमें तो हमारे आचार्य महाराज *(ज्ञानसागर जी)मालामाल कर गए हैं। माला की ल

प्रथम दर्शन की अनुभूति - संस्मरण क्रमांक 13

☀☀ संस्मरण क्रमांक 13☀☀      ? प्रथम दर्शन की अनुभूति ?        घटना 1975 की है,एक दिन जब हम ब्र. सुरेन्द्रनाथ जी (पूर्व अधिष्ठाता ईशरी आश्रम) से श्री समयसार जी का अध्ययन कर रहे थे,तब ही अचानक वे बोल उठे कि छीपीटोला,आगरा में आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज पधारे हुये है।दोपहर 2 बजे उनके दर्शन करने चलेंगे। ठीक 2 बजे हम छीपीटोला, आगरा पहुँच गये। धर्मशाला के प्रथम तले पर एक कमरे में पू. आचार्य विद्यासागर जी महाराज अकेले स्वाध्याय में तल्लीन विराजमान थे। ब्र. सुरेन्द्रनाथ जी तथा में उनको नमोस
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