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    २०. विनयांजली- आचार्य भगवन के पूरे प्राणी मात्र के प्रति उपकारों के लिये कृतज्ञता स्वरूप |

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    108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के चरण कमलों में सत-सत नमन-वन्दन 

    नमोस्तु नमोस्तु नमोस्तु गुरुवर         - अभिषेक जैन सा-परिवार

     

    तम से नित में 

    रहा दूर, होकर विषयों 

    में चूर-चूर

     

    निज देह के बन्धन

    बाँध रहे, नश्वर सुख

    के पीछे-पीछे 

     

    पल-पल भाग रहें 

    यह चाह कहा ले जायेगी

    कभी शिव-सुख 

     

    मार्ग दिखायेगी, या

    रहूँ सदा मैं आत्म-मुग्ध 

    किन्तु छुब्ध-छुब्ध

     

    इस जीवन का सार 

    न मिल पाया, व्यर्थ

    रही ये जड़ काया

     

    अब तेरी शरण में 

    आया हूँ, प्रति-पल जग 

    से छल ही पाया हूं 

     

    अब तुझ से है पहचान

    हुई, निज-आतम की 

    शुभ शरण मिलीं 

     

    अब जग विषयों की कुछ

    चाह नहीं, निज-आतम

    की ही राह सही 

     

    वस मुझें शरण मैं रख लेना

    मेरे पापों पर ध्यान नहीं

    देना, बस चाह मेरी

     

    मुझको सन्मार्ग दिखा देना

    जीवन का लक्ष्य सिखा

    देना, इतनी-सी आश मेरी।।

     

    गुरु चरणों में कोटि-कोटि नमन

    -अभिषेक जैन सा-परिवार

     

     

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